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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने की व्यवस्था पर गंभीर संवैधानिक सवाल उठाए हैं। न्यायालय ने कहा है कि उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम की धारा 12(3-ए) की संवैधानिक वैधता पर विचार करना आवश्यक है। इस मामले में पंचायती राज विभाग के अपर मुख्य सचिव को अगली सुनवाई पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया गया है। यह आदेश न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने संजय कुमार शर्मा की जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद पारित किया। न्यायालय ने याद दिलाया कि वर्ष 2000 में प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में हाईकोर्ट ने इसी तरह के प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 243-ई और 243-के के विपरीत मानते हुए असंवैधानिक घोषित किया था। हालांकि, बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने उस अपील का निस्तारण करते हुए कानून के प्रश्नों को खुला छोड़ दिया था। न्यायालय ने यह भी सवाल उठाया कि क्या ग्राम प्रधान को प्रशासक नियुक्त करने से पंचायत का कार्यकाल परोक्ष रूप से बढ़ जाता है। क्या इससे राज्य निर्वाचन आयोग की संवैधानिक शक्तियों पर कोई प्रभाव पड़ता है। इन महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों पर विस्तृत सुनवाई के लिए न्यायालय ने मामले को अन्य संबंधित जनहित याचिकाओं के साथ 10 जुलाई को सूचीबद्ध किया है।
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प्रधानों को प्रशासक बनाने पर लखनऊ हाईकोर्ट ने उठाए सवाल:पंचायती राज के अपर मुख्य सचिव तलब, 10 जुलाई को सूचीबद्ध