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ब्रजभूमि ने मंगलवार को अपने ऐसे विरक्त रसिक संत को खो दिया, जिनका पूरा जीवन श्रीराधा रानी की भक्ति, गौसेवा और ब्रजभूमि की रक्षा के लिए समर्पित रहा। पद्मश्री से सम्मानित संत रमेश बाबा ने मंगलवार को दोपहर करीब 12 बजे राधा नाम का स्मरण करते हुए प्रभुचरणों में विलीनता प्राप्त की। उनका पार्थिव शरीर गहवर वन स्थित रस मंडप में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया, जहां देर रात तक हजारों ब्रजवासियों और अनुयायियों ने पहुंच कर श्रद्धासुमन अर्पित किए। बुधवार को गहवर वन में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। प्रयागराज में जन्मे थे रमेश बाबा रमेश बाबा ब्रज के विरक्त साधु परंपरा, रसिक भक्ति और प्रकृति संरक्षण के अनन्य प्रहरी के रूप में सदैव स्मरण किए जाएंगे। उनके पिता बलदेव प्रसाद शुक्ल और माता हेमेश्वरी देवी थीं। प्रयाग में शिक्षा के दौरान ही उनके भीतर आध्यात्मिक चेतना जागृत हुई और सांसारिक जीवन से विरक्त होकर वे श्रीराधा रानी की चरण-शरण पाने ब्रज आ गए। बरसाना पहुंचकर उन्होंने श्रीजी की सेवा और नाम-स्मरण को जीवन का उद्देश्य बना लिया। प्रारंभिक दिनों में श्रीराधारानी मंदिर में मृदंग वादन करते हुए उन्होंने राधा नाम का प्रचार किया। गौसेवा और ब्रज संरक्षण बना जीवन का संकल्प गहवर वन में स्थापित माताजी गौशाला उनकी सेवा-साधना की सबसे बड़ी पहचान बनी। यहां बीमार, घायल, वृद्ध और निराश्रित गौवंश की सेवा, चिकित्सा और संरक्षण की व्यवस्था की गई। बाबा गौसेवा को केवल सेवा कार्य नहीं, बल्कि ब्रजभक्ति और श्रीराधा की सेवा का स्वरूप मानते थे। उन्होंने ब्रज के पर्वतों, गहवर वन, प्राचीन वनों, पवित्र कुंडों और यमुना जी के संरक्षण के लिए लंबे समय तक जनजागरण और आंदोलन किए। वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण के माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया कि गौ, गोवर्धन, गहवर वन, यमुना और वृक्ष ब्रज की जीवंत आध्यात्मिक विरासत हैं। रमेश बाबा ने अपना जीवन श्रीजी, गौमाता और ब्रजभूमि के लिए समर्पित कर दिया। शरीर से विदा होने के बाद भी उनकी साधना और सेवा की स्मृतियां गहवर वन की रज, बरसाना की गलियों, गौशाला और ब्रज के वन-कुंजों में जीवंत रहेंगी। ब्रज की संत परंपरा में उनका नाम त्याग, तप, भक्ति, गौसेवा और ब्रज रक्षा के लिए सदैव श्रद्धा से लिया जाता रहेगा।
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पद्म श्री रमेश बाबा का आज होंगे पंच तत्व में:गहवर वन की पावन रज में होगा अंतिम संस्कार, हजारों भक्तों ने किए अंतिम दर्शन