छापे में नकली, लैब में असली:72 करोड़ की कार्रवाई के 28 में 27 सैंपल पास, अब जांच के तरीके पर उठे सवाल


फव्वारा थोक दवा बाजार आगरा में अगस्त 2025 में हुई 72 करोड़ रुपए की दवाओं की सबसे बड़ी कार्रवाई अब सवालों के घेरे में है। छापेमारी के दौरान जिन दवाओं को फार्मा कंपनियों के अधिकृत प्रतिनिधियों ने पहली नजर में नकली बताया था, उन्हीं के 28 नमूनों में से 27 केंद्रीय लैब की जांच में मानक के अनुरूप पाए गए। सिर्फ एक दवा सस्पेक्टेड निकली। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब दवाएं लैब में सही निकलीं तो उन्हें किस आधार पर नकली मानकर करोड़ों का स्टॉक जब्त किया गया था? वहीं जून 2026 में जब्त किए गए 90 नए नमूनों की रिपोर्ट का भी इंतजार है। छापे के वक्त कंपनियों ने खुद कहा था- ये हमारी असली दवाएं नहीं हैं 22 अगस्त 2025 को औषधि विभाग और एसटीएफ ने आगरा के फव्वारा दवा बाजार में हे मां मेडिको, बंसल मेडिकल एजेंसी और उनकी सहयोगी फर्मों के साथ गोल्डन ट्रांसपोर्ट कंपनी पर छापेमारी की थी। जांच के दौरान कई दवा कंपनियों के अधिकृत प्रतिनिधियों को मौके पर बुलाया गया। उन्होंने पैकेजिंग, फॉन्ट, होलोग्राम, बैच नंबर और क्यूआर कोड का मिलान करने के बाद कई दवाओं को फर्जी बताया। जांच में सामने आया कि अधिकांश दवाएं पुडुचेरी की अमान फार्मा, मीनाक्षी फार्मा और परम हाउस के नाम पर खरीदी दिखाई गई थीं। मौके से बड़ी मात्रा में एंटी एलर्जिक दवा एलेग्रा समेत कई ब्रांड की दवाएं बरामद हुई थीं। जांच में यह भी सामने आया कि कुछ दवाओं की सप्लाई संबंधित कंपनी ने उस फर्म को कभी की ही नहीं थी। लखनऊ के अमीनाबाद मेडिसिन मार्केट में भी छापेमारी की थी। एक असली डिब्बे से बनते थे सैकड़ों नकली पैक, ऐसे खुला था खेल एसटीएफ की जांच में सामने आया कि गिरोह पहले बाजार से असली दवा का एक पैक खरीदता था। फिर उसी के बैच नंबर और क्यूआर कोड का इस्तेमाल कर 100 से लेकर 1000 तक नकली डिब्बे तैयार किए जाते थे। जब कंपनियों के प्रतिनिधियों ने जांच की तो उन्होंने पाया कि सभी डिब्बों पर एक ही क्यूआर कोड इस्तेमाल किया गया है, जबकि असली कंपनियां हर पैक पर अलग क्यूआर कोड जारी करती हैं। इसी आधार पर प्रतिनिधियों ने दवाओं को फर्जी बताया था। एसटीएफ और औषधि विभाग ने दवा किया था कि कालाबाजारी में माफिया का बड़ा फर्जीवाड़ा पकड़ा है। माफिया 10 फीसदी बिल पर दवाओं की खरीद-फरोख्त कर रहे थे। पुुडुचेरी से लखनऊ के पते पर दवाएं मंगवाते और आगरा में ही उतारकर इनको अन्य राज्यों में खपाया जा रहा था। लैब ने 27 दवाएं पास कर दीं, आखिर जांच में बदला क्या? छापेमारी के दौरान 28 नमूने केंद्रीय प्रयोगशाला भेजे गए थे। नवंबर में आई रिपोर्ट में 27 नमूने मानक गुणवत्ता वाले पाए गए और केवल निमोनिया की एक दवा अधोमानक निकली। यहीं से पूरा मामला उलझ गया। सवाल उठने लगे कि अगर कंपनियों ने मौके पर दवाओं को नकली बताया था तो लैब में वही दवाएं असली कैसे निकल गईं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रयोगशाला दवा के रासायनिक कंपोजिशन और गुणवत्ता की जांच करती है, जबकि नकली होने का निर्धारण पैकेजिंग, ट्रेडमार्क, बैच नंबर, क्यूआर कोड और सप्लाई चेन की जांच से भी जुड़ा होता है। ऐसे में दोनों जांचों का दायरा अलग हो सकता है। नौ मुकदमे दर्ज, 40 से ज्यादा आरोपी; कई जेल गए फिर बाहर आ गए इस कार्रवाई के बाद औषधि विभाग और एसटीएफ ने नौ मुकदमे दर्ज किए और 40 से अधिक लोगों को आरोपी बनाया। कई लोगों को जेल भेजा गया, लेकिन बाद में अधिकांश को जमानत मिल गई। अब दवा कारोबारियों के बीच चर्चा है कि आखिर नमूनों की जांच में ऐसा क्या हुआ कि जिन्हें मौके पर फर्जी बताया गया था, वे लैब में मानक के अनुरूप मिल गए। जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल उठ रहे हैं। अब 2026 की कार्रवाई की रिपोर्ट पर टिकी निगाह 22 से 24 जून 2026 के बीच औषधि विभाग और एसटीएफ ने फिर बड़ी कार्रवाई करते हुए 38 मेडिकल फर्मों और गोदामों से 3.80 करोड़ रुपए की दवाएं जब्त कीं। इनमें सरकारी सप्लाई की दवाएं, सैंपल, एक्सपायरी और संदिग्ध दवाएं शामिल थीं। कुल 90 नमूने जांच के लिए भेजे गए हैं। इनकी रिपोर्ट अभी आनी बाकी है। अगर इस बार भी अधिकांश दवाएं लैब में मानक के अनुरूप मिलती हैं तो जांच के आधार, कार्रवाई की प्रक्रिया और जिम्मेदारी को लेकर नए सवाल खड़े हो सकते हैं।

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