गड्‌ढों वाली सड़कों की धूल ने बिगाड़ी कानपुर की हवा:मेट्रो-सीवर की खुदाई भी बनी वजह, करोड़ों खर्च के बाद भी क्यों गिरी एयर रैंकिंग?


शहर की बदहाल सड़कें, जगह-जगह बड़े गड्ढे और निर्माण कार्यों से उड़ती धूल अब कानपुर की हवा पर भारी पड़ रही है। कई प्रमुख सड़कों पर डेढ़ फीट तक गहरे गड्ढे हैं। इनसे गुजरने वाले वाहनों के साथ धूल हवा में उड़ती रहती है। दूसरी ओर निर्माण स्थलों पर धूल रोकने के लिए पर्याप्त इंतजाम और नियमित पानी के छिड़काव की निगरानी भी प्रभावी नहीं है। इसका असर अब शहर की स्वच्छ वायु रैंकिंग पर भी दिखाई दिया है। 5 तस्वीरों में देखिए रैंकिंग गिरने की प्रमुख कमियां… स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में 10 लाख से अधिक आबादी वाले 48 शहरों की लिस्ट में कानपुर को 183.2 अंक के साथ 11वां स्थान मिला है। पिछले साल के मुकाबले शहर की रैंकिंग 6 पायदान नीचे खिसक गई है। पिछले दो सालों में कानपुर टॉप-5 में रहा था, ऐसे में इस बार की गिरावट को बड़ा झटका माना जा रहा है। 300 करोड़ से ज्यादा खर्च, फिर भी नहीं सुधरी हवा शहर की हवा को साफ करने के लिए नगर निगम और अन्य विभागों की ओर से करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। करीब 300 करोड़ रुपये से अधिक की योजनाओं के बावजूद प्रदूषण नियंत्रण में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका। नगर निगम ने पिछले दो सालों में 15वें वित्त आयोग से करीब 594 करोड़ रुपये के 765 विकास कार्य कराए हैं। इसके बावजूद शहर की कई सड़कें अब भी गड्ढों से मुक्त नहीं हो सकी हैं। वहीं लोक निर्माण विभाग भी एक साल में करीब 400 करोड़ रुपये का बजट खर्च कर चुका है, लेकिन सड़क की बदहाली और उससे उड़ने वाली धूल पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाया। मेट्रो-सीवर और सीएम ग्रिड योजना से भी बढ़ी परेशानी कानपुर में लगातार चल रहे मेट्रो, सीवर लाइन, सड़क निर्माण और अन्य विकास कार्यों के चलते कई इलाकों में धूल की समस्या बनी हुई है। सीएम ग्रिड योजना के तहत बन रही 10 सड़कों में मानकों के पालन पर भी सवाल उठ रहे हैं। सड़कें खोदने के बाद समय पर मरम्मत न होने से वाहनों की आवाजाही के दौरान मिट्टी और धूल हवा में फैल रही है। इसके अलावा ग्रीन बेल्ट में कमी और अव्यवस्थित तरीके से चल रहे विकास कार्यों को भी शहर की एयर क्वालिटी रैंकिंग में गिरावट की प्रमुख वजह माना जा रहा है। धूल नियंत्रण के नियमों पर निगरानी जरूरी शहर की हवा को बेहतर करने के लिए सिर्फ सड़क निर्माण और सफाई पर खर्च करना पर्याप्त नहीं है। निर्माण स्थलों पर नियमित पानी का छिड़काव, निर्माण सामग्री और मलबे को ढककर रखना, ग्रीन नेट लगाना और सड़कों की नियमित मशीनी सफाई जरूरी है। अब कानपुर के सामने सबसे बड़ी चुनौती सड़क की धूल और निर्माण गतिविधियों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने की है। अगर इन दोनों पर प्रभावी निगरानी नहीं बढ़ाई गई तो अगले स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में भी रैंकिंग सुधारना मुश्किल हो सकता है।

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