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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जाति प्रमाणपत्र जारी करने में हो रही गड़बड़ियों पर चिंता जताते हुए राज्य सरकार से पारदर्शी और साफ्टवेयर आधारित सिस्टम विकसित करने के लिए कहा है।
कोर्ट का कहना था कि तकनीक की मदद से फर्जी प्रमाणपत्रों पर लगाम लगाई जा सकती है।
न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने यूपी कोली कोरी प्रतिनिधि सभा की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की।
कोली’ के लोगों को ‘कोरी’ जाति का प्रमाणपत्र
याचिका में आरोप लगाया गया कि स्थानीय अधिकारी कोली’ जाति के लोगों को ‘कोरी’ जाति का प्रमाणपत्र जारी कर रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जातियों की सूची राष्ट्रपति के आदेश से तय होती है, लेकिन कई बार स्थानीय स्तर पर ऐसे लोगों को भी प्रमाणपत्र दे दिए जाते हैं जिनकी जाति का नाम सुनने या लिखने में मिलता-जुलता है।
अभी यह विवाद कोली जाति को लेकर है। कोली अनुसूचित जाति नहीं है, जबकि कोरी अनुसूचित जाति में शामिल है। सुनवाई के दौरान अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार इस मुद्दे पर विस्तृत निर्देश देगी। मजबूत सॉफ्टवेयर आधारित प्रमाणीकरण प्रणाली लागू करें खंडपीठ ने कहा कि अभी प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार तहसीलदार स्तर के अधिकारियों के पास है। इससे मनमानी और गलत प्रमाणपत्र जारी होने की आशंका रहती है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि राज्य सरकार एससी, एसटी और ओबीसी के लिए मजबूत सॉफ्टवेयर आधारित प्रमाणीकरण प्रणाली लागू करे।
इससे पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होगी और अधिकारियों की मनमानी खत्म होगी। साथ ही प्रमाणपत्रों का ऑडिट और सत्यापन भी आसान हो जाएगा। कोर्ट ने कहा कि जिस तरह जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र और शिक्षा बोर्ड की मार्कशीट पर अब यूनीक नंबर और क्यूआर कोड होते हैं, उसी तरह जाति प्रमाणपत्रों पर भी ये सुविधाएं दी जा सकती हैं। इससे असली प्रमाणपत्र की तुरंत पहचान हो सकेगी। राज्य सरकार की मांग पर कोर्ट ने अगली सुनवाई 23 जुलाई 2026 को टॉप 10 मामलों में सूचीबद्ध कर दी है। याची संस्था का कहना है कि फर्जी प्रमाणपत्रों की वजह से वास्तविक अनुसूचित जाति के लोगों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
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क्यूआर कोड वाला साफ्टवेयर विकसित करे सरकार: हाईकोर्ट:फर्जी जाति प्रमाणपत्र चिंताजनक, कोली' को 'कोरी' प्रमाणपत्र के मामले गंभीर