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अमरोहा में मोहर्रम की 10वीं तारीख को हजारों अकीदतमंदों ने इमाम हुसैन की शहादत पर मातम मनाया। शहर की हर गली, इमामबाड़ा और चौक पर “या हुसैन” की सदाएं गूंजती रहीं। इस दौरान काले लिबास में लोगों ने सीना पीटा और कई स्थानों पर जंजीरी मातम भी किया गया, जिसमें खून बहा। मातम का यह सिलसिला सुबह तुर्बतों की बरामदगी के साथ शुरू हुआ और देर शाम तक जारी रहा। माजापोता, दानिशमंदान, बगला, चाह गौरी, गंज, लाल मस्जिद, दरबार शाह विलायत और जाफरी सहित शहर के दर्जनों इमामबाड़ों से ताजिए निकाले गए। ये ताजिए मुख्य जुलूस में शामिल हुए, जहां अकीदतमंदों ने नौहे पढ़े और मातम किया। मजलिसों में कर्बला की घटना, इमाम हुसैन के छह महीने के बेटे अली असगर और जवान बेटे अली अकबर की शहादत का जिक्र किया गया। इस दौरान कई लोग भावुक हो गए। दरबार शाह विलायत में भुवन शर्मा ने सलाम पेश किया, जो अमरोहा की गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद हजरत अली अकबर के ताबूत की जियारत भी कराई गई। खाक-ए-शफा की तस्बीह की जियारत भी की गई, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। शाम ढलने तक ताजिए अपनी-अपनी इमामबारगाहों में वापस लौट गए। हालांकि, “या हुसैन” की सदाएं देर रात तक शहर में गूंजती रहीं। उत्तर प्रदेश के कई शहरों में मोहर्रम के जुलूस निकाले जाते हैं। अमरोहा में मोहर्रम के ऐतिहासिक ताजिए और मातम की परंपरा विशेष महत्व रखती है। आशूरा के दिन यह शहर इमाम हुसैन की कुर्बानी और उनके आदर्शों को याद करने का केंद्र बन जाता है।
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अमरोहा में मोहर्रम की 10वीं तारीख, हर गली बनी कर्बला:अकीदतमंदों ने किया मातम, जंजीरी मातम में बहा खून