अपने आचरण से बच्चों को उत्तम संस्कार दें माता-पिता:गोरखनाथ मंदिर में आयोजित श्रीमद़भागवत कथा में बोले कथा व्यास स्वामी राजेंद्रदास


ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 57वीं तथा राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की 12वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन वृंदावन से आए कथा व्यास जगद्गुरु स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य ने व्यास पीठ से सीता वन गमन, लव-कुश जन्म सहित श्रीरामचरितमानस और श्रीमद्भागवत के विभिन्न प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने तुलसीदास रचित गीतावली के पदों का गान भी किया। कथा व्यास ने कहा कि जानकी उसी समय महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुंचती हैं, जब वाल्मीकि श्रीरामायण की रचना करने का निश्चय करते हैं। उन्होंने जानकी को आश्रम में स्थान दिया और उनकी कृपा से ही इतना महान काव्य लिखा गया। उन्होंने कहा कि शिक्षा वहां से प्रारंभ होती है, जहां धर्म और संस्कारों से युक्त व्यक्तित्व सामने होता है। बच्चा वही सीखता है, जो वह प्रत्यक्ष रूप से देखता है। इसलिए माता-पिता को अपने घर में बच्चों के सामने अपना उत्तम चरित्र और आदर्श आचरण प्रस्तुत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को हमारे बोलने से उतनी प्रेरणा नहीं मिलती, जितनी हमारे व्यवहार से मिलती है। उन्होंने कहा कि संस्कारों की पाठशाला जन्म से नहीं, बल्कि गर्भ से प्रारंभ होती है। सनातनी पाठशाला सद्गृहस्थ के घरों में चलती है। ऐसा संस्कार-व्यवस्था का स्वरूप दुनिया में अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। आत्मसुख की अनुभूति कराने वाला कर्म ही धर्म का मूल कथा व्यास ने कहा कि संपूर्ण धर्म का मूल परमात्मा है। जिस कर्म को करने से आत्मग्लानि के स्थान पर आत्मसुख की अनुभूति होती है, वह धर्म का मूल है। वहीं जिस कर्म को करने के बाद हृदय में पश्चाताप उत्पन्न हो और दूसरे को भी दुःख पहुंचे, वह अधर्म का मूल है। धर्म और सदाचार में धर्मनिष्ठ व्यक्ति के अंतःकरण की प्रवृत्तियां ही प्रमाण होती हैं। धर्मनिष्ठ व्यक्ति स्वप्न में भी गलत आचरण नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत में सनातन धर्म के 30 लक्षण बताए गए हैं। इन लक्षणों को जाने बिना सनातन धर्म पर व्याख्यान नहीं देना चाहिए। सत्य, अहिंसा, दया आदि ये धर्मलक्षण चारों वर्णों के लोगों तथा पुरुष और महिला सभी के लिए समान रूप से हैं। इसी कारण सनातन धर्म को विश्वकल्याण का धर्म कहा गया है। वास्तविक धर्म अपने आचरण से किसी को पीड़ा न पहुंचाने और प्राणी मात्र के प्रति करुणा रखने को प्रधानता देता है। भक्ति और साधना का अहंकार भी भक्त के लिए बाधक स्वामी जी ने कहा कि भौतिक पद और प्रतिष्ठा का अहंकार तो होता ही है, किंतु सात्त्विक साधनों की प्राप्ति का अहंकार भी बहुत खतरनाक होता है। इससे भक्त को बचना चाहिए। भगवान और संतों की कृपा के बिना भगवान का एक नाम भी कोई नहीं ले सकता। इसलिए यह अहंकार नहीं करना चाहिए कि हम बहुत बड़े भक्त हैं या बहुत भजन करते हैं। हमारे जीवन में जो कुछ उपलब्धि है, वह भगवान की कृपा से प्राप्त हुई है। ‘मेरा कुछ नहीं है’—इस भाव को हृदय से स्वीकार करना चाहिए। दंड व्यवस्था से समाज में अनुशासन बना रहता है उन्होंने कहा कि अपराधी को अपराध का दंड न दिया जाए तो दूसरे लोगों की भी अपराध में प्रवृत्ति बढ़ती है। उन्होंने उत्तर प्रदेश की वर्तमान व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि योगी आदित्यनाथ जी बिना भेदभाव और बिना पक्षपात के अपराधियों को कठोर दंड देने की नीति पर कार्य कर रहे हैं, जिससे व्यवस्था सुचारु रूप से चल रही है। उन्होंने कहा कि जब दंड व्यवस्था अपने चारों चरणों से शत-प्रतिशत लागू होती है, तब सतयुग माना जाता है। 75 प्रतिशत लागू होने पर त्रेतायुग, 50 प्रतिशत लागू होने पर द्वापर और 25 प्रतिशत लागू होने पर कलियुग कहा जाता है। 33 करोड़ देवी-देवता सनातन धर्म की विविधता नहीं, समाधान हैं कथा व्यास ने कहा कि सनातन धर्म की विशेषता है कि हम एक की अनेक में और अनेक की एक में उपासना करते हैं। 33 करोड़ देवी-देवता उपासक के लिए समस्या नहीं, बल्कि समाधान हैं। सभी देवी-देवता एक ही परमात्मा के विभिन्न स्वरूप हैं। साधक अपनी रुचि के अनुसार किसी भी स्वरूप की भक्ति कर सकता है। उन्होंने साधक की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि कौन कितने जन्मों से साधना के मार्ग पर चल रहा है और कौन कितना बड़ा संत है, इसे भगवान के अतिरिक्त कोई नहीं जान सकता। साधक की भक्ति जन्म-जन्मांतर तक चलती है। भक्ति का एक क्षण भी कभी व्यर्थ नहीं जाता।

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