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नई दिल्ली3 मिनट पहले
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सरकारी नौकरी में क्रीमी लेयर के कैंडिडेट के आरक्षण लेने पर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा- अगर माता-पिता दोनों IAS अफसर हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए?
शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण के साथ-साथ सामाजिक गतिशीलता भी आती है। ऐसे में अगर संपन्न बच्चों के लिए फिर से आरक्षण मांगा जाए, तो हम कभी भी इस चक्र से बाहर नहीं निकल पाएंगे।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने ये कमेंट तब किया। जब वे कर्नाटक हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रहे थे।
याचिकाकर्ता को क्रीमी लेयर के आधार पर आरक्षण के दायरे से बाहर रखा गया था। क्योंकि उसके माता-पिता दोनों ही राज्य सरकार के कर्मचारी हैं।

अब जानिए क्या है पूरा मामला
यह मामला कर्नाटक में ‘कुरुबा’ समुदाय से जुड़े एक उम्मीदवार का है। कर्नाटक के पिछड़े वर्गों की सूची में इस समुदाय को ‘श्रेणी II(A)’ के तहत रखा गया है।
उम्मीदवार यानी याचिकाकर्ता का ‘कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड’ में ‘सहायक इंजीनियर’ के पद पर सिलेक्शन हुआ था। उसकी आरक्षित कोटे के तहत नियुक्ति की गई थी।
हालांकि, ‘जिला जाति और आय सत्यापन समिति’ ने उम्मीदवार को’जाति प्रमाण पत्र’ देने से इनकार कर दिया और कहा कि वह ‘क्रीमी लेयर’ के दायरे में आता है।
उम्मीदवार के परिवार की सालाना आमदनी लगभग ₹19.48 लाख आंकी गई थी। अधिकारियों ने पाया कि उसके माता-पिता दोनों ही सरकारी कर्मचारी हैं और उनकी कुल आमदनी, ‘क्रीमी लेयर’ के लिए तय की गई सीमा से ज्यादा है।
नियमों के अनुसार OBC आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ की मौजूदा आय सीमा सालाना 8 लाख रुपए है। यानी अगर किसी OBC परिवार की वार्षिक आय 8 लाख रुपए से ज्यादा है, तो आमतौर पर उनके बच्चों को OBC आरक्षण का लाभ नहीं मिलता।
