शशांक राठौर | बरेली3 मिनट पहले
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उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है। इसी बीच मौलाना शहाबुद्दीन रज़वी बरेलवी के एक खुले पत्र ने मुस्लिम राजनीति के भीतर एक नई बहस छेड़ दी है।
मौलाना ने अपने पत्र में स्पष्ट कहा है कि अब मुस्लिम समाज को “भय और असुरक्षा” की राजनीति से बाहर निकलना होगा। उन्होंने सवाल उठाया कि लंबे समय से एकतरफा राजनीतिक समर्थन देने के बावजूद मुस्लिम मुद्दों पर मजबूती से आवाज क्यों नहीं उठाई गई।
खास तौर पर अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के रवैये पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी मुस्लिम मुद्दों पर खुलकर बोलने से बचती रही है।
मौलाना के पत्र का सबसे अहम पहलू यह है कि उन्होंने सीधे तौर पर “वोट बैंक राजनीति” पर चोट की है। उनका कहना है कि चुनाव के समय भाजपा का डर दिखाकर मुस्लिम वोट हासिल किए जाते हैं, लेकिन चुनाव के बाद समुदाय के मुद्दे प्राथमिकता में नहीं रहते।
उन्होंने यह भी कहा कि प्रदेश की राजनीति बदल चुकी है और अब मुस्लिम समाज को केवल भावनात्मक नारों से आगे बढ़कर राजनीतिक हिस्सेदारी और नेतृत्व पर ध्यान देना चाहिए।
मौलाना रज़वी ने उलमा, बुद्धिजीवियों, डॉक्टरों, प्रोफेसरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से मिलकर नई रणनीति बनाने की अपील की है। राजनीतिक जानकार इसे मुस्लिम समाज के भीतर “स्वतंत्र राजनीतिक सोच” को बढ़ावा देने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में लंबे समय से मुस्लिम वोट मुख्य रूप से भाजपा विरोधी राजनीति के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है। लेकिन मौलाना के इस पत्र ने यह संकेत दिया है कि अब समुदाय के भीतर यह सवाल उठने लगा है कि क्या केवल भाजपा को रोकना ही राजनीतिक लक्ष्य होना चाहिए, या फिर शिक्षा, प्रतिनिधित्व, सुरक्षा और आर्थिक हिस्सेदारी जैसे मुद्दों पर भी नई राजनीतिक दिशा तय की जानी चाहिए।
पत्र में मुलायम सिंह यादव द्वारा नरेंद्र मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने की कामना और योगी आदित्यनाथ व अखिलेश यादव की मुलाकातों का जिक्र कर मौलाना ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि राजनीतिक दलों के बीच अंदरूनी समीकरण अलग हो सकते हैं, इसलिए मुस्लिम समाज को अपनी रणनीति खुद तय करनी चाहिए।
