दीपेंद्र द्विवेदी | कानपुर3 मिनट पहले
- कॉपी लिंक

जब अस्पताल की दीवारों के भीतर जिंदगी और मौत के बीच सिर्फ एक यूनिट खून का फासला रह जाता है, तब न कोई धर्म काम आता है, न जाति और न ही सरहदें। उस वक्त काम आता है सिर्फ एक अनजान इंसान की रगों से बहा वह खून, जो किसी और के लिए नई जिंदगी बन जाता है। इसी भावना के साथ सोमवार को विश्व रक्तदाता दिवस पर जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज का ब्लड बैंक विभाग गुमनाम हीरोज के सम्मान का केंद्र बना।
95 बार रक्तदान, तरनजीत सिंह बने सबसे बड़े प्रेरणास्रोत
कार्यक्रम में जब शहर के जाने-माने रक्तदाताओं को मंच पर सम्मानित किया गया तो पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। सबसे ज्यादा चर्चा रही तरनजीत सिंह की, जिन्होंने अब तक 95 बार रक्तदान कर मानवता की मिसाल पेश की है।
उनके अलावा एसके त्रिपाठी और विवेक सूरी ने 84-84 बार रक्तदान किया, जबकि अजय शंकर दीक्षित 83 बार रक्तदान कर चुके हैं। अमित मिश्रा ने 72 बार और डॉ. यशवंत राव ने 47 बार रक्तदान कर समाज के सामने मिसाल रखी है।
महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। चरनजीत कौर ने 13 बार और इश्मीत कौर ने 18 बार रक्तदान कर इस मुहिम को नई ताकत दी है।

48 हजार से ज्यादा मरीजों को मिला जीवनदान
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक ने अब तक 48 हजार से अधिक यूनिट रक्त और इसके अवयव (प्लेटलेट्स व प्लाज्मा) जरूरतमंद मरीजों तक पहुंचाए हैं। डॉक्टरों के अनुसार, यह केंद्र थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों, सड़क दुर्घटनाओं के घायलों और गंभीर मरीजों के लिए लगातार जीवनरेखा बना हुआ है।
अधिकारियों ने बताया कि कानपुर का यह ब्लड सेंटर स्वैच्छिक रक्तदान शिविरों के आयोजन में उत्तर प्रदेश में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
समाजिक संस्थाओं की अहम भूमिका
इस अभियान को सफल बनाने में कई सामाजिक संस्थाओं की अहम भूमिका रही। इनमें सिविल डिफेंस, कानपुर थैलेसीमिया सोसाइटी, रोटरी क्लब, मानवता फाउंडेशन और बजरंग दल जैसी संस्थाएं शामिल रहीं, जिन्हें उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया।
अंधविश्वास तोड़कर बढ़ा रक्तदान का कारवां
कार्यक्रम में डॉक्टरों ने कहा कि रक्तदान को लेकर समाज में फैली गलत धारणाएं अब धीरे-धीरे टूट रही हैं। लोगों में यह जागरूकता बढ़ी है कि रक्तदान से कमजोरी नहीं आती, बल्कि यह कई जिंदगियों को बचाने का सबसे सरल और बड़ा माध्यम है।
इसी जागरूकता का परिणाम है कि आज सैकड़ों परिवारों के लिए समय पर खून उपलब्ध हो पा रहा है और हजारों मरीजों को नई जिंदगी मिल रही है।
