दीपेंद्र द्विवेदी | कानपुर3 मिनट पहले
- कॉपी लिंक

कानपुर स्थित छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU) परिसर जल्द ही आयुर्वेद की प्राचीन और गौरवशाली परंपरा का साक्षी बनने जा रहा है। विश्वविद्यालय की औषधि वाटिका में दुनिया के पहले शल्य चिकित्सक (सर्जन) माने जाने वाले महर्षि सुश्रुत और उनके शिष्यों की मूर्तियां स्थापित की जाएंगी। रविवार को इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत मूर्तियों के फाउंडेशन और एक पारंपरिक कुटी के निर्माण के लिए भूमिपूजन एवं शिलान्यास किया गया।
नीमा वुमेन्स फोरम उत्तर प्रदेश की सचिव एवं वरिष्ठ आयुर्वेदाचार्या डॉ. वंदना पाठक ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच परियोजना का शुभारंभ किया। विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य केवल मूर्तियों की स्थापना नहीं, बल्कि एक ऐसे प्रेरणा केंद्र का निर्माण करना है, जहां लोग भारतीय चिकित्सा पद्धति और आयुर्वेद के गौरवशाली इतिहास को करीब से जान सकें।

फाइन आर्ट्स के छात्रों ने तैयार कीं मूर्तियां इस परियोजना की विशेष बात यह है कि महर्षि सुश्रुत और उनके शिष्यों की मूर्तियां बाजार से नहीं खरीदी गई हैं। इन्हें विश्वविद्यालय के फाइन आर्ट्स (ललित कला) विभाग के छात्र-छात्राओं ने स्वयं तैयार किया है।
जूतिबली यादव और डॉ. राज कुमार सिंह के मार्गदर्शन में छात्रों ने इन कलाकृतियों को आकार दिया है। फाइन आर्ट्स विभाग के निदेशक डॉ. मिठाई लाल ने छात्रों की रचनात्मकता और मेहनत की सराहना करते हुए कहा कि इन मूर्तियों में प्राचीन भारतीय चिकित्सा परंपरा की झलक दिखाई देती है।
कुटी में दिखेगा प्राचीन चिकित्सा तंत्र औषधि वाटिका में बनने वाली पारंपरिक कुटी के भीतर महर्षि सुश्रुत की मुख्य प्रतिमा के साथ उनके शिष्यों की मूर्तियां भी स्थापित की जाएंगी। इनके माध्यम से यह प्रदर्शित किया जाएगा कि प्राचीन काल में औषधियों का निर्माण किस प्रकार होता था, रोगियों का उपचार कैसे किया जाता था और शल्य चिकित्सा की प्रक्रियाएं किस तरह संपन्न होती थीं। यह प्रदर्शनी आयुर्वेद के विद्यार्थियों, चिकित्सकों और शोधार्थियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होगी।
सुश्रुत जयंती पर मेडिकल कैंप की तैयारी विश्वविद्यालय प्रशासन आगामी महर्षि सुश्रुत जयंती के अवसर पर यहां एक बड़े मेडिकल कैंप के आयोजन की भी तैयारी कर रहा है। इससे आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा के बीच समन्वय को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
विश्वविद्यालय का मानना है कि इस प्रकार की परियोजनाएं छात्रों को अपनी कलात्मक प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर देती हैं, साथ ही उन्हें भारत की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ती हैं। यह पहल परिसर में आने वाले विद्यार्थियों, शोधार्थियों और आगंतुकों को आयुर्वेद, चिकित्सा विज्ञान के इतिहास और भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
कई शिक्षक और छात्र रहे मौजूद भूमिपूजन कार्यक्रम में राकेश मिश्रा, सुभाष तिवारी सहित विश्वविद्यालय के अनेक शिक्षक, शोधार्थी और छात्र उपस्थित रहे। सभी ने इस परियोजना को भारतीय चिकित्सा परंपरा के संरक्षण और प्रचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
