INDIA bloc leaders in letter to CJI

नई दिल्ली7 मिनट पहले

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INDIA ब्लॉक की सातवीं बैठक पिछले महीने 8 जून को दिल्ली में हुई थी। - Dainik Bhaskar

INDIA ब्लॉक की सातवीं बैठक पिछले महीने 8 जून को दिल्ली में हुई थी।

विपक्षी दलों के गठबंधन INDIA ब्लॉक ने ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को एक संयुक्त पत्र लिखकर चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं और चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप की मांग की है। पत्र में (SIR) को रोकने और आगामी चुनावों में ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से चुनाव कराने पर विचार करने की मांग की गई है।

28 जून को लिखे गए इस पत्र को विपक्ष ने शुक्रवार (3 जुलाई) को मीडिया में जारी किया। पत्र में विपक्ष ने यह स्पष्ट किया कि वह न्यायपालिका पर सवाल नहीं उठा रहा है। पत्र जारी करते हुए कांग्रेस के महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल ने कहा-

हमारे देश में चुनावी लोकतंत्र को सबसे गंभीर खतरा है। पारदर्शिता के हित में और इस उम्मीद में कि सर्वोच्च न्यायालय चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता, जवाबदेही और उसमें विश्वास बहाल करने के लिए तत्काल आवश्यक ठोस कदम उठाएगा। मैं यह पत्र जारी कर रहा हूं।

लोकतंत्र का भविष्य गंभीर परिणामों से भरा हुआ

निर्दलीय सांसद कपिल सिबल समेत 24 विपक्षी दलों के नेताओं द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में लिखा गया है कि लोकतंत्र का भविष्य गंभीर परिणामों से भरा हुआ है जब संस्थाएं स्वयं दमन के साधन बन जाती हैं और सरकार के एजेंडे को आगे बढ़ाती हैं।

न्यायाधीश एकांतवास में नहीं रहते। आप भी जमीनी हकीकत से वाकिफ हैं। जब हर संभव उपाय विफल हो जाता है, तब भी लोग न्यायपालिका पर भरोसा रखते हैं। इसलिए जब न्यायपालिका प्रतिक्रिया देने में विफल रहती है, तो यह गणतंत्र के पूर्ण पतन का संकेत देता है।

नेताओं ने कहा कि वे अदालत का रुख इसलिए कर रहे हैं। क्योंकि, उनका मानना ​​है कि लोकतांत्रिक संस्थाएं दबाव में हैं और कई मामलों में चुनावी परिणाम जनता की इच्छा को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं करते हैं।

विपक्ष ने अपने पत्र में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर पक्षपात करने का आरोप लगाया।

विपक्ष ने अपने पत्र में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर पक्षपात करने का आरोप लगाया।

सरकार के इशारों पर हुई चुनाव आयोंग में नियुक्तियां: विपक्ष

विपक्षी दलों ने 2014 के बाद से चुनाव आयोग के आचरण का विस्तृत वर्णन करते हुए कहा कि 2014 से पहले आयोग में शामिल व्यक्तियों की सत्यनिष्ठा पर सवाल उठने के कुछ अपवादों को छोड़कर शायद ही कोई उदाहरण था।

लेकिन 2014 के बाद से सरकार द्वारा की गई लगभग हर नियुक्ति ऐसे व्यक्तियों की हुई है, जो सरकार से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं और चुनाव परिणामों में हेरफेर करने के लिए सरकार के इशारों पर खुलेआम काम करते हुए देखे गए हैं।

विपक्ष ने अपने पत्र में कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का “स्पष्ट रूप से पक्षपातपूर्ण आचरण”, चुनावी प्रक्रिया के दौरान और उसके परिणामों में भाजपा को उनका खुला और निर्भीक समर्थन गंभीर चिंता का विषय है।

विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि हाल के वर्षों में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता कमजोर हुई है। अनूप बरनवाल मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया से संबंधित न्यायिक चिंताएं अभी भी प्रासंगिक हैं।

पार्टियों ने SIR आयोजित करने के औचित्य पर भी सवाल उठाए।

पार्टियों ने SIR आयोजित करने के औचित्य पर भी सवाल उठाए।

बांग्लादेशी घुसपैठ के आंकड़े जारी नहीं किए गए: विपक्ष

पार्टियों ने SIR के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कहा- इस प्रक्रिया से जुड़ी राजनीतिक बयानबाजी बिहार की मतदाता सूचियों में बांग्लादेशियों की कथित घुसपैठ पर केंद्रित थी।

अब जबकि बिहार विधानसभा चुनाव समाप्त हो चुके हैं, ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है, जो यह दर्शाता हो कि वास्तव में ऐसी घुसपैठ हुई थी। साथ ही चुनाव आयोग ने भारत में अवैध रूप से मतदान का अधिकार प्राप्त करने वाले बांग्लादेशियों की संख्या के संबंध में कोई आंकड़े भी सार्वजनिक नहीं किए।

पश्चिम बंगाल में स्थिति और भी बदतर हो गई, जहां विपक्ष ने कहा कि 24 लाख सीएपीएफ कर्मियों की मौजूदगी से सरकार घिरी हुई है। इस बात को समझने के लिए 2024 के पूरे लोकसभा चुनाव के लिए 35 लाख सीएपीएफ कर्मियों को तैनात किया गया था।

पहले कभी इस्तेमाल न की गई इस श्रेणी के तहत मनमाने ढंग से मतदाताओं को हटाने और तार्किक विसंगतियों के कारण लगभग 25 लाख मतदाताओं के बाहर होने की भी शिकायत की गई।

पत्र में कहा गया है- हमारा मानना ​​है कि दिल्ली, हरियाणा और महाराष्ट्र में हाल ही में हुए चुनावों में भी धांधली हुई थी।”

विपक्ष ने मतदाता सूची में व्यापक संशोधन को तत्काल निलंबित करने की मांग की है, उनका तर्क है कि ऐसा संशोधन तभी किया जाना चाहिए, जब अगला विधानसभा चुनाव कम से कम पांच साल बाद हो।

उनका कहना है कि इससे आयोग के प्रतिनिधियों को घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करने की सुविधा मिलेगी, न कि उस दस्तावेजी प्रक्रिया के माध्यम से जिसे पहले कभी नहीं अपनाया गया था।

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