Anant Singh Political Entry | Bahubali Rise in Patna Badh History

साल 1990 का वक्‍त। पटना में तैनात डिस्ट्रिक्ट जज किसी काम से पटना जिले के बाढ़ कस्बे के पास नदवां गांव जा रहे थे। बाढ़ रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतरे, जहां पहले से ही सरकारी गाड़ी उनका इंतजार कर रही थी। जज साहब गाड़ी में बैठ गए और नदवां की ओर चल पड़े।

.

गाड़ी नदवां पहुंचने ही वाली थी कि ड्राइवर ने कहा, ‘जज साहब, गाड़ी का शीशा नीचे कर लीजिए…आगे चेकिंग होगी।’

जज साहब सोच में पड़ गए और बोले, ‘डिस्ट्रिक्ट जज की तलाशी कौन ले सकता है।’ ड्राइवर ने कहा, ‘नदवां अनंत सिंह का गांव है सरजी। मुहाने पर हथियारों से लैस उनके लोग 24 घंटे बैठे रहते हैं। अनंत सिंह की सिक्‍योरिटी के खातिर हर आने-जाने वाले की चेकिंग करते हैं।’

जज साहब को यकीन ही नहीं हुआ। गाड़ी जब नदवां पहुंची तो उन्‍होंने देखा, लकड़ी के बड़े से लट्ठे से फाटक बनाया गया था। 12-13 आदमी बंदूकें लिए वहां खड़े थे और सभी गाड़ियों की तलाशी ले रहे थे। जज साहब ने चुपचाप अपनी गाड़ी की तलाशी दी और नदवां में दाखिल हुए।

आज बूझे की नाही में कहानी अनंत सिंह और उनके परिवार के पॉलिटिक्स में आने की…।

बात 1970-71 की है। नदवां गांव के चंद्रदीप सिंह के बेटे दिलीप सिंह टमटम चलवाया करते थे। इससे उनका घर खर्च चलता था। इसी दौरान उनकी मुलाकात तस्कर कामदेव से हुई। कामदेव भारत से नेपाल सामान की तस्करी करता था। उससे धीरे-धीरे दिलीप सिंह की नजदीकी बढ़ी और उसका राइट हैंड हो गए। कुछ दिन बाद कामदेव की हत्या हो गई। और उसकी कुर्सी पर दिलीप सिंह ने कब्जा कर लिया।

1975 आते-आते उनका पूरे मोकामा एरिया में दबदबा हो गया। क्राइम की दुनिया में दिलीप सिंह बड़े नाम हो गए थे, लेकिन रिकॉर्ड में उनके खिलाफ कोई संगीन मुकदमा दर्ज नहीं था।

कांग्रेस नेता ने चुनाव जीतने के लिए दिलीप सिंह का लिया साथ

80 के दशक में चुनाव बैलेट पेपर से होता था। यह वही दौर था जब राजनेता अपनी जीत के लिए बाहुबल का सहारा लेते थे। बिहार में बूथ कैप्चरिंग अपने परवान पर था। 1980 विधानसभा चुनाव में श्याम सुंदर सिंह धीरज कांग्रेस के सीताराम केसरी गुट से चुनाव लड़ रहे थे। जगन्नाथ मिश्र उन्हें हराना चाहते थे।

कांग्रेस की आंतरिक सियासत से उबरने के लिए तब पहली बार श्याम सुंदर सिंह धीरज ने इलाके के दबंग दिलीप सिंह की मदद ली। उन्होंने खुलकर सपोर्ट किया और धीरज चुनाव जीत गए। मोकामा के जानकारों की मानें तो ये औपचारिक तौर पर यहां की सियासत में बाहुबलियों की एंट्री थी।

लालू यादव ने बिहार सरकार में दिलीप सिंह को मंत्री बनाया था। (फाइल फोटो)

लालू यादव ने बिहार सरकार में दिलीप सिंह को मंत्री बनाया था। (फाइल फोटो)

मोकामा के सियासी गलियारों में एक किस्सा है कि श्याम सुंदर सिंह धीरज को 1985 का चुनाव जिताने के बाद एक बार दिलीप सिंह उनसे मिलने पटना के सरकारी आवास में चले गए थे। इस पर उन्होंने मिलने से मना कर दिया।

तब उन्होंने दिलीप सिंह से कहा था, ‘दिन के समय मिलने मत आया करो। तुम कोई शरीफ आदमी या अधिकारी तो हो नहीं। शाम होने के बाद आया करो और वो भी छुपकर।’

ये बात दिलीप सिंह को इतनी चुभी कि उन्होंने श्याम सुंदर सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। 1990 विधानसभा चुनाव में दिलीप सिंह से श्याम सुंदर सिंह धीरज 20 हजार से ज्यादा वोट से हार गए। इसके बाद 1995 के चुनाव में भी हारे। तब लालू यादव ने इनाम के तौर पर दिलीप सिंह को मंत्री बना दिया।

जुर्म की दुनिया में अपना पैर जमाने के बाद 2000 में सूरजभान सिंह ने सियासत की दुनिया में कदम रखा। उन्होंने मोकामा से 2000 में तत्कालीन बिहार सरकार के मंत्री दिलीप सिंह के खिलाफ जेल से ही पर्चा भरा। अपने पहले चुनाव में ही दिलीप सिंह को 70 हजार वोट से हरा दिया था।

बताया जाता है कि दिलीप सिंह की सूरजभान सिंह से यह हार अनंत सिंह को चुभ गई। उसके बाद उन्होंने इसका बदला लेने की ठान ली।

2003 विधान परिषद चुनाव में दिलीप सिंह जीत गए। लेकिन दिलीप सिंह की यह जीत सूरजभान सिंह के खिलाफ नहीं थी। सूरजभान तब नीतीश कुमार के खेमे में थे।

2004 लोकसभा चुनाव में बाढ़ सीट से नीतीश कुमार करीब 38 हजार वोटों से चुनाव हार गए। तब उनका झुकाव अनंत सिंह की तरफ हुआ।

उस वक्त अनंत सिंह अपने राजनीतिक दुश्मन सूरजभान से बदला लेने के लिए लगातार फील्ड में डटे हुए थे। नीतीश कुमार से बढ़ती नजदीकी की जानकारी पटना के CM हाउस तक पहुंच गई थी।

घायल अनंत सिंह को गिरफ्तार करने अस्‍पताल पहुंची पुलिस

सीनियर जर्नलिस्ट ज्ञानेश्‍वर के अनुसार, 2 जुलाई 2004, सवेरे उठकर अनंत सिंह अपने घर की बैठक में शेविंग करवा रहे थे। तभी विवेका पहलवान के घर की खिड़की खुली। किसी को समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ। अचानक खिड़की से Ak-47 से फायरिंग शुरू हो गई। एक गोली अनंत सिंह की छाती में लगी।

जवाब में अनंत सिंह के लोग दौड़कर विवेका पहलवान के घर पहुंचे और दरवाजा तोड़कर अंदर घुसे, लेकिन अंदर उन्हें कोई नहीं मिला। हमला करने वाले सभी लोग घर के पीछे के दरवाजे से अब तक भाग चुके थे।

दूसरी ओर अनंत सिंह का काफी खून बह चुका था। उन्हें तुरंत गाड़ी में बैठाकर पटना ले जाया गया। आलोक नर्सिंग होम की इमरजेंसी में डॉ. नरेंद्र प्रसाद ने इलाज शुरू किया।

डॉ. प्रसाद ने कहा, ‘खून काफी बह चुका है और अनंत सिंह जी की इंजरी भी बहुत क्रिटिकल है। इन्हें बचाना मुश्किल है…।’

अनंत के भाई दिलीप सिंह ने डॉक्टर की कनपट्टी पर पिस्तौल रख दी, बोले ‘ऐसे कैसे बचाना मुश्किल है… अगर हमरे भाई को कुछ हुआ तो तू भी अपने परिवार का मुंह नहीं देख सकेगा डॉक्टर…।’

इसके बाद पूरा नर्सिंग होम अनंत सिंह की सेवा में लग गया। कई घंटे की सर्जरी के बाद आखिरकार अनंत सिंह की जान बच गई। कई दिनों तक उन्हें अस्पताल में रहना पड़ा।

यहीं पर उन्हें पुलिस गिरफ्तार करने आ गई। अस्पताल से छूटने पर उन्हें सीधा जेल ले जाया गया। इस घटना के बाद अनंत सिंह ने नदवां गांव में रहना छोड़ दिया और वो पटना में रहने लगे।

2005 विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने उन्हें JDU से टिकट दिया। तब उन्होंने सूरजभान के समर्थित लोजपा के नलिनी रंजन शर्मा उर्फ ललन सिंह को हराकर राजनीति में जीत का ताज पहना। इसके बाद से आज तक मोकामा सीट पर इनका कब्जा है।

साल 2015 में बिहार में महागठबंधन बन चुका था और लालू यादव भी इसका हिस्सा थे। लालू के दबाव में अनंत सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया। इसके बाद 2015 का विधानसभा चुनाव अनंत सिंह ने निर्दलीय लड़कर जीत लिया। इससे पटना में धमक वैसी ही बनी रही।

14 जुलाई 2019 की रात एक ऑडियो तेजी से वायरल होना शुरू हुआ। 24 मिनट 58 सेकेंड के इस ऑडियो में अनंत सिंह किसी के साथ मिलकर अपने पुराने साथी भोला सिंह की हत्या की प्लानिंग करते सुनाई दिए।

ऑडियो वायरल होते ही प्रशासन के कान खड़े हो गए और पुलिस की कार्रवाई शुरू हो गई। पुलिस जांच में साबित हुआ कि वायरल ऑडियो में अनंत सिंह की ही आवाज थी।

अगले महीने 16 अगस्त को पटना के ग्रामीण SP क्रांति शर्मा और ASP लिपि सिंह पूरे लाव-लश्कर के साथ सुबह 4 बजे नदवां गांव पहुंच चुके थे। उन्होंने अनंत सिंह के घर पर छापेमारी शुरू कर दी। 18 घंटों तक चली छापेमारी में पूरी हवेली तोड़ दी गई।

SHO बाढ़ के मुताबिक, पुलिस को घर से दैनिक भास्कर अखबार में लिपटी AK47 मिली। इसके अलावा हैंड ग्रेनेड और 26 गोलियों की भी जब्ती दिखाई गई। घर के केयरटेकर सुनील राम को गिरफ्तार कर लिया गया और अनंत सिंह के खिलाफ UAPA और आर्म्‍स एक्‍ट समेत कई धाराओं में मुकदमे दर्ज किए गए।

17 अगस्त को अनंत सिंह के पटना स्थित सरकारी आवास पर रेड डाली गई, लेकिन यहां से अनंत सिंह गायब हो गए। पटना पुलिस ने कहा, ‘अनंत सिंह नेपाल भाग सकता है। इसलिए वो जहां भी मिले, एयरपोर्ट पर, स्टेशन पर, उसे गिरफ्तार कर लिया जाए।’

पुलिस ने बाढ़ कोर्ट से उनकी गिरफ्तारी का वारंट तो लिया था, लेकिन अब तक गिरफ्तारी हो नहीं पाई थी।

18 अगस्त को एक वीडियो Twitter पर पोस्ट हुआ। जिसमें अनंत सिंह कहते हैं, ‘हम भागे नहीं हैं…हमारा एक दोस्त बीमार पड़ गया है, उसी में उलझ गए हैं। जहां AK-47 की जब्ती हुई वहां तो हम 2004 से ही नहीं गए। लिपि सिंह ही AK-47 रखे हैं। 3-4 दिन में हम सीधा कोर्ट में सरेंडर करेंगे….।’

लिपि सिंह ने गिरफ्तारी की कोशिशें और तेज कर दीं। 10 नई टीमें बनाईं गईं और 200 से ज्यादा जवानों को इस काम में लगाया गया। पूरे बिहार में छापेमारी होने लगी। इस बीच अनंत सिंह पटना से बिना नंबर प्लेट की होंडा सिटी गाड़ी से गया पहुंच गए। वहां एक स्थानीय नेता ने उन्हें दूसरी गाड़ी मुहैया कराई। इससे वो सड़क के रास्‍ते ही दिल्ली पहुंच गए।

23 अगस्त 2019 को शुक्रवार का दिन था। दिल्ली के साकेत कोर्ट में वकीलों और जजों ने आना शुरू ही किया था। यहीं अनंत सिंह अपने कुछ साथियों के साथ पहुंचे और उन्हाेंने सरेंडर कर दिया।

लिपि सिंह खबर मिलते ही तुरंत दिल्ली के लिए निकलीं। उन्‍होंने शनिवार को छुट्टी वाले दिन अर्जेंट एप्लिकेशन लगाई और अनंत सिंह को ट्रांजिट रिमांड के लिए पटना लाया गया।

बाढ़ कोर्ट में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट मिथिलेश कुमार तिवारी की अदालत में अनंत सिंह की पेशी हुई। अदालत ने अनंत सिंह से पूछा, ‘आप ठीक है ना….।’ अनंत सिंह ने कहा, ‘हां ठीक हैं अब…। चार दिन पहले बुखार हो गया था, लेकिन अब ठीक हैं…..।’

अनंत सिंह को 30 अगस्त तक ज्यूडिशियल रिमांड पर भेजने का आदेश दिया गया। इसके बाद बेउर जेल भेज दिया गया।

2020 का विधानसभा चुनाव आ चुका था। इस बार तेजस्‍वी यादव ने अनंत सिंह को RJD से टिकट दिया। JDU ने राजीव लोचन सिंह को उम्मीदवार बनाया। अनंत सिंह ने जेल में रहते हुए एक बार फिर जीत हासिल की। इस बार उन्हें 2015 के मुकाबले और ज्यादा वोट मिले थे।

विधायक बनने के बावजूद अनंत सिंह को जमानत नहीं मिली। 21 जून 2022 को उन्हें 10 साल जेल की सजा सुनाई गई।

बिहार विधानसभा की सदस्यता भी खत्म कर दी गई। हालांकि, उनकी पत्नी नीलम सिंह RJD के टिकट पर उपचुनाव जीत गईं और विधायक बन गईं।

2024 में इसी मामले में पटना हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि छापेमारी के समय अनंत सिंह या परिवार का कोई सदस्‍य घर पर मौजूद नहीं था। इसके अलावा, 16 अगस्‍त को हुई छापेमारी में बताया गया कि दैनिक भास्‍कर अखबार में लिपटी AK-47 मिली, जबकि इस अखबार पर तारीख थी 27 अगस्‍त। इसके चलते अनंत सिंह को आर्म्स एक्ट के मामले में बरी कर दिया गया।

2025 विधानसभा चुनाव में अनंत सिंह फिर JDU के टिकट पर चुनाव लड़े और जीते।

अनंत सिंह की ढाल क्यों बने हैं ललन सिंह?

JDU प्रत्याशी नीरज कुमार का खुला विरोध करने वाले अनंत सिंह के समर्थन में केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह आ गए हैं। उन्होंने उनकी शिकायतों को सही माना है। अब सवाल उठ रहा है कि ललन सिंह बाहुबली का क्यों समर्थन कर रहे हैं…?

पॉलिटिकल एनालिस्ट संजय सिंह बताते हैं, ‘अनंत सिंह धनबल और बाहुबल दोनों से मजबूत नेता हैं। अनंत सिंह ने निर्दलीय से लेकर हर पार्टी से चुनाव जीतकर बता दिया है कि उनकी अपने इलाके में मजबूत पकड़ है। जबकि, नीरज कुमार के साथ ऐसा नहीं है। वह पार्टी के बदौलत नेता हैं।’

वह कहते हैं, ‘अनंत सिंह की एक खासियत है उनकी साफगोई वाली पॉलिटिक्स। वह सामने से टक्कर लेने वाले नेता हैं। ऐसे नेताओं को बड़े नेता पसंद करते हैं। अनंत सिंह की राजनीति में बहुत महत्वकांक्षा नहीं है।’

संजय सिंह कहते हैं, ‘ललन सिंह की लोकसभा सीट मुंगेर में मोकामा आता है। ऐसे में वह अपनी सीट के एक मजबूत क्षत्रप को सपोर्ट नहीं करेंगे तो किसका करेंगे।’

रेफरेंस :

youtube.com/@KhabronKePiche

youtube.com/watch?v=AXobsw7YzbI

thehindu.com/news/national/other-states/absconding-bihar-mla-anant-singh-surrenders-in-delhis-saket-court/article29231566.ece

bhaskar.com/local/bihar/patna/news/bahubali-anant-singh-released-from-jail-133489061.html

carnegieendowment.org/posts/2017/01/anant-singh-the-ganglord-of-mokama

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Newsmatic - News WordPress Theme 2026. Powered By BlazeThemes.