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लखनऊ के नेशनल पीजी कॉलेज में मंगलवार को इतिहास विभाग की ओर से एक खास शैक्षणिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। कॉलेज परिसर में हुए इस विशेष व्याख्यान ने छात्रों को नेतृत्व के नए आयामों से रूबरू कराया। कार्यक्रम का विषय था—’नेतृत्व विकास की पुनर्कल्पना: पश्चिमी परिप्रेक्ष्य और प्राचीन भारतीय प्रतिमान’, जिसने आधुनिक सोच और भारतीय परंपरा को एक मंच पर जोड़ दिया। इस प्रतिष्ठित सत्र के मुख्य वक्ता प्रो. सिद्धार्थ सिंह रहे, जो नव नालंदा महाविहार के कुलपति हैं। अपने संबोधन में उन्होंने कूटनीति, बौद्ध दर्शन और प्रबंधन के अनुभवों को बेहद सरल और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। उनकी बातों ने छात्रों को सोचने पर मजबूर कर दिया कि असली नेतृत्व क्या होता है। काम के बीच के संघर्ष को उदाहरण बनाकर बताया कार्यक्रम की शुरुआत प्राचार्य प्रो. देवेंद्र के. सिंह के स्वागत भाषण से हुई। वहीं इतिहास विभाग की अध्यक्ष डॉ. आकृति कुमार ने पूरे सत्र का संचालन संभाला। व्याख्यान के दौरान प्रो. सिंह की समृद्ध साहित्यिक पृष्ठभूमि का भी जिक्र हुआ। वे प्रसिद्ध साहित्यकार काशीनाथ सिंह के पुत्र और चर्चित आलोचक नामवर सिंह के भतीजे हैं। प्रो. सिंह ने अपने भाषण की शुरुआत उर्दू के मशहूर शायर इन्ने इंशा की नज़्म से की। उन्होंने इश्क और काम के बीच के संघर्ष को उदाहरण बनाकर बताया कि जीवन में संतुलन कितना जरूरी है। इसी के साथ उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी साझा किए, जिसमें उप्साला विश्वविद्यालय, स्वीडन में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में उनका कार्यकाल शामिल रहा। पश्चिमी ‘ट्रेट थ्योरी’ की सीमाओं पर सवाल उठाए व्याख्यान के दौरान उन्होंने एडोल्फ हिटलर का उदाहरण देते हुए बताया कि हर प्रभावशाली व्यक्ति महान नेता नहीं होता। उन्होंने पश्चिमी ‘ट्रेट थ्योरी’ की सीमाओं पर सवाल उठाए और भारतीय दृष्टिकोण को ज्यादा संतुलित बताया।बौद्ध दर्शन का उल्लेख करते हुए उन्होंने एक आदर्श नेता के चार गुण बताए—समाज को जोड़ने की क्षमता, मित्रता का भाव, उदारता और निस्वार्थ सेवा। उन्होंने सम्राट अशोक के जीवन का उदाहरण देकर बताया कि कैसे एक व्यक्ति अपने भीतर बदलाव लाकर महान बन सकता है।
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प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने नेतृत्व पर व्याख्यान दिया:नेशनल पीजी कॉलेज में पश्चिमी और भारतीय प्रतिमानों पर चर्चा