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आज रविवार को शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो गई है। वाराणसी में प्रथम दिन माता शैलपुत्री के दर्शन का विधान है। माता का अति प्राचीन मंदिर वरुणा नदी के तट पर अलईपुर में मौजूद हैं। जहां मंगला आरती के बाद से भक्त माता के दर्शन के लिए उमड़े हुए हैं। लंबी कतारें मंदिर तक पहुंच रही हैं। भक्त मंदिर का पट खुलने के बाद से दर्शन-पूजन कर रहे हैं। नवरात्रि की प्रथम आराध्य देवी देवी शैलपुत्री के अलईपुरा स्थित मंदिर के साथ ही काशी के सभी देवालयों में दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ा हुआ है। दुर्गाकुंड स्थित माता कुष्मांडा का आज स्वर्ण श्रृंगार किया गया। साथ ही गौरी पूजन के तहत पहले दिन गायघाट स्थित हनुमान मंदिर में विराजमान प्रथम गौरी मुख निर्मालिका गौरी के दर्शन पूजन करने के लिए भक्त पधार रहे हैं। कलश स्थापना के समय ये मंत्र पढ़ें “कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः। मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः।।” अर्थ- कलश के मुख में विष्णुजी, कण्ठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा और कलश के मध्य में सभी मातृ शक्तियां निवास करती हैं। पूजा के दौरान दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती या देवी मंत्रों का पाठ कर सकते हैं। समय के अभाव में मां दुर्गा के मंत्रों का जाप और ध्यान भी किया जा सकता है। 19 अक्टूबर को संधि पूजा करें, 48 मिनट का योग ज्योतिषाचार्य पं. ऋषि द्विवेदी ने बताया- नवरात्रि में महाअष्टमी और महानवमी के संधिकाल का विशेष महत्व है। अष्टमी तिथि के आखिरी 24 मिनट और नवमी तिथि के शुरुआती 24 मिनट को संधिकाल कहा जाता है। इस दौरान संधि पूजा की जाती है। इस वर्ष संधि पूजा 19 अक्टूबर को सुबह 10.27 बजे से 11.15 बजे तक होगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी संधिकाल में मां दुर्गा ने चामुंडा का रूप धारण कर चंड और मुंड नाम के असुरों का वध किया था। इसलिए इस समय की जाने वाली पूजा को विशेष फलदायी माना जाता है। श्रद्धालु इस दौरान मां भगवती की आराधना कर सुख, शांति और परिवार की मंगलकामना करें। जानिए नवरात्रि की पूजा विधि 20 या 21 अक्टूबर को कर सकते हैं व्रत पारण 20 अक्टूबर को नवमी और विजयादशमी दोनों तिथियां हैं। नवमी तिथि पर 20 अक्टूबर की सुबह हवन, पूजन और पूर्णाहुति की जा सकेगी। वहीं, व्रत के पारण को लेकर श्रद्धालुओं को अपनी पारंपरिक मान्यताओं और शास्त्रीय विधान का ध्यान रखना चाहिए। धर्माचार्य विनय पांडेय ने बताया- अश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवरात्रि की शुरुआत होती है और नवमी तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। तिथियों के घटने-बढ़ने के कारण कभी नवरात्रि 8 दिन तो कभी 9 या 10 दिन की भी होती है। उन्होंने बताया कि व्रत के पारण को लेकर अलग-अलग परंपराएं हैं। कुछ श्रद्धालु हवन और पूर्णाहुति के बाद दशमी तिथि में पारण करते हैं, जबकि कुछ शुद्ध दशमी तिथि में पारण करना उचित मानते हैं। ऐसे में श्रद्धालुओं को अपने परिवार की परंपरा और मान्यताओं के अनुसार तय करना होगा कि वे 20 अक्टूबर को पारण करें या 21 अक्टूबर को। हाथी पर आगमन खुशहाली तो मुर्गे पर जाना राजनीतिक बदलाव के संकेत काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के डॉ. सुभाष पांडेय ने बताया- नवरात्रि की शुरुआत रविवार को होने के कारण इस बार मां दुर्गा का आगमन हाथी पर होगा। धार्मिक मान्यताओं में हाथी को अच्छी वर्षा, कृषि की समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ ही वातावरण में भी शुद्धता आती है और भक्तों के रोग-दोष भी दूर होते हैं। वहीं, नवरात्रि का समापन मंगलवार को होने के कारण देवी का गमन मुर्गे यानी कुक्कुट पर होगा। तीन अन्य स्थितियां भी जानिए- 1. देश-दुनिया में स्थिरता : हाथी पर माता के सवार होकर आने से शांति और स्थिरता देश-दुनिया में आ सकती है। वैश्विक स्तर पर जो अशांति का माहौल है वह शांत हो सकता है। दुश्मन देशों के बीच भी बातचीत की स्थिति बन सकती है, मित्रता बढ़ सकती है। समाज में भी भाईचारे की भावना फैलती है। 2. आर्थिक पक्ष में मजबूती : माता का हाथी पर सवार होकर आना धन, वैभव और समृद्धि का प्रतीक भी है। इसलिए शारदीय नवरात्रि के बाद लोगों के जीवन में भी आर्थिक स्थिरता आ सकती है। शेयर बाजार और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में तेजी आ सकती है। लोगों को रोजगार के नए अवसर मिल सकते हैं। 3. राजनीतिक बदलाव : ज्योतिष की मानें तो माता के मुर्गे पर सवार होकर जाने से देश-दुनिया में राजनीतिक बदलाव भी देखने को मिल सकते हैं। यह बदलाव सकारात्मक होते हैं। सत्ता और विपक्ष के बीच चल रहा टकराव कम हो सकता है। साथ ही वैश्विक राजनीति में भी स्थिरता देखने को मिल सकती है। 9 दिन, 9 देवियों की आराधना होती है
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नवरात्रि का पहला दिन,माता शैलपुत्री मंदिर में भीड़:माता का हुआ स्वर्ण श्रृंगार,जयकारों से गूंज रहा मंदिर