शामली की निशा करतीं महाकाल का श्रृंगार:कोरोना में खाली हुईं तो शुरू किया काम, हुनर से बनाई पहचान, कला से जोड़ी आस्था


शामली में कोरोना काल में जब ज्यादातर लोग घरों में रहकर समय गुजार रहे थे, तब शामली की 25 साल की निशा वर्मा ने अपने खाली समय को हुनर में बदलने की शुरुआत की। नवरात्र के दौरान उन्होंने पहली बार घर पर माता रानी की मूर्ति बनाई। यह उनका पहला प्रयास था, लेकिन इसी ने उन्हें ऐसी राह दिखाई, जिस पर चलते हुए आज वह धार्मिक कलाकृतियां और श्रृंगार तैयार कर रही हैं। निशा बताती हैं कि वर्ष 2020 में शुरू हुआ यह सिलसिला धीरे-धीरे उनके जीवन का हिस्सा बन गया। शुरुआत में उन्होंने भभूत से महाकाल का स्वरूप तैयार किया। इसके बाद भूतनाथ सहित कई धार्मिक स्वरूपों पर काम किया। कला के प्रति रुचि बढ़ती गई तो उन्होंने इसमें नए प्रयोग भी शुरू किए। मां के साथ हनुमान धाम पहुंचीं, यहीं से मिला नया आइडिया निशा के हुनर को आगे बढ़ाने में उनकी मां पूनम देवी की भी अहम भूमिका रही। सावन के दौरान मां के साथ हनुमान धाम पहुंचने के बाद निशा के मन में विचार आया कि मंदिर की तस्वीर और धार्मिक स्वरूपों को अपनी कला के माध्यम से और सुंदर बनाया जाए। इसके बाद हनुमान टीला स्थित मंदिर से उनका जुड़ाव बढ़ता गया। पिछले करीब तीन साल से निशा हनुमान टीला पर माता रानी की मूर्ति और महाकाल के श्रृंगार का काम कर रही हैं। वह धार्मिक अवसरों के अनुसार स्वरूप को सजाने और आकर्षक बनाने में अपना हुनर लगाती हैं। उनके लिए यह सिर्फ कला नहीं, बल्कि आस्था से जुड़ा काम भी है। बीकॉम और बीएड की पढ़ाई, बच्चों को भी सिखाती हैं ड्राइंग निशा ने वर्ष 2019 में बीकॉम और वर्ष 2023 में बीएड की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के साथ ही उनकी रुचि कला में बनी रही। वह बच्चों को ड्राइंग भी सिखाती हैं। गणित के शिक्षक के साथ मिलकर बच्चों को पढ़ाने का काम भी करती हैं। उनका मानना है कि बच्चों के भीतर छिपी प्रतिभा को सही दिशा मिले तो वे अपनी अलग पहचान बना सकते हैं। निशा के पिता योगेंद्र वर्मा की ज्वेलर्स की दुकान है। परिवार में माता-पिता और बड़ी बहन आंचल वर्मा हैं। परिवार से मिले सहयोग ने भी उन्हें अपने हुनर को आगे बढ़ाने का हौसला दिया। कहती हैं- आस्था को कला से जोड़ना सबसे बड़ी खुशी निशा कहती हैं कि माता रानी की पहली मूर्ति बनाने के समय उन्होंने नहीं सोचा था कि यह शौक आगे चलकर उनकी पहचान बन जाएगा। अब धार्मिक स्वरूपों का श्रृंगार और कलाकृतियां बनाते समय उन्हें अलग तरह की संतुष्टि मिलती है। उनका सपना है कि वह अपनी कला को और निखारें और आने वाले समय में बड़े स्तर पर धार्मिक कलाकृतियां तैयार करें।

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