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ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 57वीं तथा ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की 12वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा के 5वें दिन कथा व्यास, वृंदावन से आए स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य ने लव-कुश के नामकरण संस्कार तथा गुरुकुल शिक्षा का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि गोविंदा की शरणागति करने का सामर्थ्य गौ माता में ही है। गोसेवा करने पर उनकी कृपा से भगवान का साक्षात दर्शन हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण भी गोसेवा की कामना से ब्रज में आकर प्रत्यक्ष गोसेवा का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। श्रीकृष्ण को हम पाना चाहते हैं और श्रीकृष्ण गाय को पाना चाहते हैं। इसलिए गाय की सेवा करो, श्रीकृष्ण स्वयं प्राप्त हो जाएंगे। किसी अन्य साधन की आवश्यकता नहीं होगी। गाय को पशु न मानें। गाय भगवान भी नहीं है, अपितु भगवान का भी भगवान गाय है। कथा व्यास ने कहा कि कुलीनता जीवन का सद्गुण है। अच्छे माता-पिता और कुलीन वंश में ही महापुरुष पैदा होते हैं। आज के समय में इसको महत्व न देकर अंतर्जातीय विवाह किए जा रहे हैं, यह ठीक नहीं है। इससे वर्णसंकर संताने पैदा होंगी और वर्णसंकर संताने अपने पूर्वजों को भी नरक में धकेल देती हैं। इसलिए सनातन धर्म की रक्षा करनी है तो अंतर्जातीय विवाह को रोकना होगा। अंतर्जातीय विवाह की व्यवस्था में पिंडदान आदि श्रद्धा की प्रक्रिया नहीं हो पाती है। उन्होंने कहा कि गुलामी के समय में क्रांति का बीज गोरक्षा थी, किंतु आजादी के 80 वर्ष बाद भी भारत के लोग देश को गोवध से मुक्त नहीं कर पाए हैं। कथा व्यास ने कहा कि जीवन में गुरु-कृपा का विशेष महत्व है। एक सच्चा गुरु अपने शिष्य पर पूर्ण कृपा करें तो शिष्य का कल्याण सुनिश्चित होता है। उन्होंने कहा कि जब से ब्रज मंडल में भगवान का आगमन होता है, तब से वहां लक्ष्मी जी नित्य निवास करने लगीं। गोपियां कहती हैं कि ब्रज तो अब बैकुंठ से भी अधिक सुंदर हो गया है। कथा व्यास ने कहा कि भगवान की लीला में भक्तों को विस्मित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें शंका रहित होकर विश्वास करना चाहिए, क्योंकि ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं। जो धर्मनिष्ठ, सदाचारी संत होते हैं, उनका जागृत भी सत्य होता है और स्वप्न भी सत्य होता है। ऐसे संतजनों का दर्शन कर लेने मात्र से जीव का कल्याण हो जाता है। कथा व्यास ने कहा कि जीवन में विपरीत परिस्थिति आने पर व्याकुल न होकर धैर्य रखना चाहिए, अन्यथा नई बीमारी उत्पन्न हो जाती है। आज समाज में डिप्रेशन की बीमारी का बहुत प्रभाव हो गया है। इसका मुख्य कारण भगवान के प्रति विश्वास की कमी है। हम भगवान को मानते तो हैं, लेकिन वैसा नहीं मानते जैसा मानना चाहिए। भगवान की शरणागति ही हमारा लक्ष्य है। सभी जीवों का अपना घर भगवान की शरणागति ही है। जब तक वह नहीं मिलेगा, तब तक हमारा प्रवास ही रहेगा। उन्होंने कहा कि भगवान ही हमारे रक्षक हैं और भगवान ही हमारी शरण भी हैं। उनके भजन और कथा-श्रवण से हमारा जीवन भयमुक्त और सुखमय हो जाता है। वह जिसको अपना बनाते हैं, उसका कल्याण किए बिना नहीं छोड़ते हैं। उन्होंने पूतना राक्षसी को भी दूध पीने के लिए पकड़ा और कल्याण करके ही छोड़ा। कथा व्यास ने कहा कि हमारा शरीर और यह संसार हमारा नहीं है, यह तो पराया है। हमारे अपने तो केवल भगवान ही हैं। इसलिए भगवान हमें पकड़े रहते हैं। हम भले ही उनको भूल जाते हैं, पर वे हमें कभी नहीं भूलते। इस बात की अनुभूति हम नहीं कर पाते, इसलिए दुखी रहते हैं। यदि अनुभूति हो जाए तो हम दुखी नहीं होंगे। जिस प्रकार जल में रहकर भी मछली प्यासी रहती है, उसी प्रकार हम भगवान के भरोसे रहकर भी उनको जान नहीं पाते।
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गोसेवा से श्रीकृष्ण की प्राप्ति संभव:श्रीमद्भागवत कथा में बोले स्वामी राजेंद्रदास; 5वें दिन किया लव-कुश के नामकरण का वर्णन