जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, भाजपा व सपा में टिकट के लिए जोर लगाने वालों की संख्या बढ़ गई है। भाजपा में तो खुले तौर पर टिकट मांगने वाले कम नजर आ रहे हैं लेकिन सपा में लगभग हर विधानसभा में टिकट के एक से अधिक दावेदार हैं और वे यही दावा कर रह
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इस बीच भाजपा हर विधानसभा क्षेत्र में उन नेताओं पर नजर रख रही है, जो विधानसभा में काफी अच्छा सामाजिक कार्य कर रहे हैं और जनता को जोड़ने में लगे हैं। ऐसे कई नेता हैं, जो किस पार्टी में जाएंगे, यह भी तय नहीं है। ऐसे ही लोगों के बारे में पार्टी पदाधिकारियों को जानकारी जुटाने को कहा गया है। पार्टी के लिए वे फायदेमंद नजर आए तो चुनाव से पहले उनकी ज्वाइनिंग भी कराई जा सकती है।

संगठन के पदाधिकारियों की बैठक में भी हर विधानसभा में तैयारी कर रहे नेताओं के बारे में जानकारी जुटाने के निर्देश दिए गए हैं।
भाजपा अपने दल के संभावित बागी प्रत्याशियों से होने वाले नुकसान के साथ दूसरे दलों के बागियों से होने वाले फायदे का आकलन भी कर रही है। भाजपा में चिल्लूपार, पिपराइच व कैंपियरगंज में कुछ नेता मुखर होकर टिकट मांग रहे हैं और क्षेत्र में जनसंपर्क भी कर रहे हैं। लेकिन सपा में देखें तो गोरखपुर शहर व चिल्लूपार को छोड़कर लगभग हर सीट पर एक से अधिक दावेदार हैं। वे यहां से लखनऊ तक दौड़ लगा रहे हैं। इनमें यादव नेताओं की संख्या भी अधिक है।
गोरखपुर क्षेत्र के अन्य जिलों में भी सपा के भीतर यही स्थिति है। इसके अतिरिक्त कई ऐसे नेता भी हैं जो धड़ल्ले से जनसंपर्क कर रहे हैं लेकिन अभी किसी पार्टी का झंडा या बैनर इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। उनकी ओर से क्षेत्र के लोगों के बीच काम किया जा रहा है। कुशीनगर के सीमावर्ती विधानसभा के कुछ ऐसे ही नेताओं का जिक्र भाजपा के प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े ने संगठन के बैठक के दौरान भी किया था।
प्रदेश प्रभारी ने जिलाध्यक्षों को इस बात की जिम्मेदारी दी है कि विधानसभा क्षेत्रों में राजनीतिक विश्लेषण करें। वहां अपनी पार्टी के साथ ही उन नेताओं पर भी नजर रखें जो स्वतंत्र रूप से तेयारी कर रहे हैं। जो संभावित निर्दल प्रत्याशी हैं, उनके लड़ने से किसे फायदा और किसे नकसान हो सकता है, इस बात का विश्लेषण करने को भी कहा गया है। विश्लेषण करके रिपोर्ट अक्टूबर तक प्रदेश प्रभारी के पास भेजनी होगी।
वरिष्ट पत्रकार डीबीबी मिश्र कहते हैं कि भाजपा की रणनीति ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने की है। विधानसभावार असंतुष्ट नेताओं के बारे में जानकारी जुटाने और उन्हें पार्टी में लाने के पीछे विपक्षी को कमजोर करना उद्देश्य है। यदि किसी निर्दल प्रत्याशी के लड़ने से सपा का नुकसान होगा तो यह भाजपा के लिए अच्छा होगा और इस सर्वे के आधार पर पार्टी इसी तरह की जानकारी जुटाकर अपना प्रत्याशी भी तय करेगी।