विलुप्त हो रही भाषाओं-संस्कृतियों पर संपूर्णानंद में 5 डिप्लोमा कोर्स:करीब 200 बच्चों ने लिया एडमिशन; ऑनलाइन चलेंगी कक्षाएं


संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में देश की विलुप्त होती भाषाओं और आदिवासी संस्कृतियों को बचाने के लिए नए पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैं। विश्वविद्यालय ने जनजातीय कार्य मंत्रालय के साथ हुए एमओयू के तहत इस सत्र से 5 नए सालभर के डिप्लोमा पाठ्यक्रम शुरू किए हैं। इनमें संताली भाषा के साथ आदिवासी क्षेत्रों की कला, संस्कृति, भाषा और पारंपरिक वस्त्रकला से जुड़े विषय शामिल हैं। इन पांचों पाठ्यक्रमों में अब तक औसतन करीब 40-40 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया है, यानी करीब 200 विद्यार्थी जुड़ चुके हैं। अभी ऑनलाइन प्रवेश प्रक्रिया जारी है, इसलिए संख्या आगे बढ़ेगी। इन पाठ्यक्रमों की कक्षाएं मुख्य रूप से ऑनलाइन चलेंगी और जरूरत के अनुसार विशेषज्ञ विश्वविद्यालय आकर ऑफलाइन कक्षाएं भी कराएंगे। 5 नए डिप्लोमा में करीब 200 बच्चे जुड़े संस्कृत विश्वविद्यालय और जनजातीय कार्य मंत्रालय के साथ हुए एमओयू के तहत इसी सत्र में पांच नए डिप्लोमा पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैं। इनमें संताली भाषा और उससे जुड़ी संस्कृति, आदिवासी कला, भाषा और पारंपरिक वस्त्रकला जैसे विषय शामिल हैं। प्रत्येक पाठ्यक्रम में अभी औसतन करीब 40 विद्यार्थी प्रवेश ले चुके हैं। ऑनलाइन प्रक्रिया चलने के कारण विश्वविद्यालय आज की तारीख में सटीक संख्या बताने की स्थिति में नहीं है। ऑनलाइन होगी पढ़ाई, विशेषज्ञ भी लेंगे क्लास इन पाठ्यक्रमों की ऑनलाइन व्यवस्था जनजातीय कार्य मंत्रालय से जुड़ी है। मंत्रालय की ओर से विशेषज्ञों के माध्यम से भी कक्षाएं संचालित की जाएंगी। विश्वविद्यालय के डीन शैलेश कुमार मिश्रा ने बताया कि विशेषज्ञ कुछ दिनों के लिए यहां आकर ऑफलाइन कक्षाएं भी ले सकते हैं। अप्रैल में हुआ था एमओयू डीन प्रो. शैलेश कुमार मिश्रा के मुताबिक जनजातीय कार्य मंत्रालय के साथ यह एमओयू अप्रैल-2025 के आसपास हुआ था। इसके बाद इस शैक्षणिक सत्र से पांच नए डिप्लोमा पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैं। अभी इनमें प्रवेश प्रक्रिया चल रही है। संस्कृति के वाहकों को मिलेगा सम्मान विश्वविद्यालय का मानना है कि जब किसी क्षेत्र की भाषा और संस्कृति मुख्यधारा से दूर रहती है तो उससे जुड़े लोगों में भी उपेक्षा की भावना आ सकती है। भाषाओं और संस्कृतियों को बचाना मुख्य उद्देश्य प्रो. शैलेश कुमार मिश्रा ने कहा कि भारत की पहचान उसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता से है। कई आदिवासी क्षेत्रों की भाषाएं और पारंपरिक कलाएं धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। इन पाठ्यक्रमों का उद्देश्य ऐसी भाषाओं और संस्कृतियों को पढ़ाई से जोड़कर संरक्षित करना है, ताकि नई पीढ़ी इनके बारे में जाने और इन्हें आगे बढ़ाए। पारंपरिक कला को आधुनिक बाजार से जोड़ने की तैयारी इन पाठ्यक्रमों के पीछे एक उद्देश्य पारंपरिक कला को आधुनिक तकनीक और बाजार से जोड़ना भी है। विश्वविद्यालय के अनुसार आदिवासी क्षेत्रों की पारंपरिक वस्त्रकला को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर नए उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इससे इन कलाओं के लिए बाजार और मांग पैदा होने की संभावना है, साथ ही संस्कृति का संरक्षण भी हो सकेगा।

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