लखनऊ हाईकोर्ट ने नवजात की मौत की जांच रिपोर्ट मांगी:कोर्ट ने कहा- नए मेडिकल कॉलेज में सुविधाएं क्यों नहीं, 15 दिन में जवाब दें


इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सुल्तानपुर से लखनऊ रेफर किए गए नवजात की मौत में राज्य सरकार को 15 दिन में जांच कर रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया। जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजिव शुक्ला की बेंच ने मेडिकल सुविधाओं को छोटे शहरों तक पहुंचाने पर भी जोर दिया। कोर्ट ने कहा- लखनऊ के बड़े अस्पतालों पर मरीजों का बहुत ज्यादा दबाव है। इसलिए नए मेडिकल कॉलेजों में जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ स्पेशल और सुपर स्पेशियलिटी सुविधाएं विकसित की जाएं और उन्हें वेंटिलेटर जैसी जरूरी व्यवस्थाओं से लैस किया जाए। इससे मरीजों को इलाज के लिए दूसरे शहरों में रेफर करने की जरूरत कम होगी। अपर मुख्य सचिव से रोडमैप मांगा कोर्ट ने चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव को शपथपत्र के जरिए समय-सीमा वाला रोडमैप पेश करने को कहा है। इसमें मेडिकल सुविधाओं को मजबूत करने के तत्काल और लंबे समय के उपायों की जानकारी देनी होगी। कोर्ट ने कहा कि प्रदेश की बड़ी आबादी गांवों में रहती है और बहुत से लोग बड़े अस्पतालों की जटिल प्रक्रियाओं से परिचित नहीं होते। ऐसे मरीजों और उनके परिजनों को अस्पताल परिसर में उचित मार्गदर्शन मिलना चाहिए। इसके लिए योग्य कर्मचारियों या मेडिकल सोशल वर्करों की व्यवस्था की जाए, जो मरीजों की समस्याएं समझकर डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों से समन्वय कर सकें। ऑनलाइन रेफरल सिस्टम बनाने पर जोर पीठ ने राज्य सरकार को ऑनलाइन रेफरल सिस्टम विकसित करने की जरूरत भी बताई। इससे मरीज की मेडिकल रिपोर्ट, दस्तावेज और रेफरल से जुड़ी जानकारी अस्पतालों के बीच सीधे साझा की जा सकेगी। कोर्ट ने कहा कि इससे मरीज को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाने में इलाज का जरूरी समय बर्बाद होने से बचाया जा सकेगा। सुनवाई के दौरान KGMU की ओर से बताया गया कि नवजात को अस्पताल लाया गया था, लेकिन NICU में उस समय बेड खाली नहीं था। वहीं, बच्चे के परिवार ने आरोप लगाया कि उन्हें नवजात को डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान ले जाने के लिए कहा गया। परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि एंबुलेंस में बच्चे की जांच कराने के उनके अनुरोध पर ध्यान नहीं दिया गया। KGMU ने इस आरोप से इनकार किया है। कोर्ट ने कहा कि इस विवादित पहलू पर आगे विचार किया जाएगा। परिवार का बयान भी जांच में दर्ज होगा कोर्ट ने मृत नवजात के परिवार से भी बातचीत की। परिवार ने कहा कि उन्हें बच्चे को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाने के लिए मजबूर होना पड़ा और समय पर इलाज नहीं मिल सका। पीठ ने अपर मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि परिवार के इस बयान को भी जांच अधिकारी दर्ज करें और जांच के दौरान इसे ध्यान में रखें। मेडिकल बजट की जानकारी नहीं दे सकी सरकार कोर्ट ने कहा कि एक अन्य संबंधित याचिका में राज्य सरकार से पूछा गया था कि प्रदेश के नागरिकों को चिकित्सा सुविधाएं और सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए बजट का कितना प्रतिशत आवंटित किया जाता है। सुनवाई के दौरान दोबारा यह जानकारी मांगी गई, लेकिन सरकार की ओर से जवाब नहीं दिया गया। पीठ ने कहा कि चिकित्सा सुविधाओं के लिए बजट की कमी को नागरिकों को बेहतर इलाज देने में बाधा नहीं बनने दिया जाना चाहिए। राज्य सरकार को उच्च गुणवत्ता वाली चिकित्सा सुविधाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए। मामले की अगली सुनवाई 1 अक्टूबर को होगी। अगली तारीख पर अपर मुख्य सचिव, चिकित्सा शिक्षा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई में शामिल होंगे। KGMU, SGPGI और डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के संबंधित विभागों के तथ्य से परिचित डॉक्टर भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मौजूद रहेंगे।

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