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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लेखपाल पद की भर्ती में लोकोमोटर दिव्यांगता वाले अभ्यर्थियों को आरक्षण से बाहर किए जाने के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि सरकार ने 30 जुलाई 2021 के शासनादेश में लोकोमोटर दिव्यांगता की श्रेणी को आरक्षण से बाहर करने का कोई उचित कारण या तर्क नहीं दिया।
बाद में 30 सितंबर 2024 के शासनादेश से इस श्रेणी को फिर आरक्षण में शामिल कर लिया गया। कोर्ट ने इसे सरकार की गलती माना और कहा कि इस गलती का खामियाजा अभ्यर्थियों को नहीं भुगतना पड़ेगा। यह आदेश न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने नीतू कुमार समेत 22 अन्य की ओर से दाखिल रिट याचिका पर दिया।
क्या थी याचिका जानिये याचियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे ने पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि सभी याची दिव्यांग हैं और उन्हें लेखपाल भर्ती में आरक्षण का लाभ मिलना था, लेकिन 30 जुलाई 2021 के शासनादेश में लोकोमोटर दिव्यांगता को आरक्षण के दायरे से बाहर कर दिया गया। बाद में सरकार ने 30 सितंबर 2024 को संशोधित शासनादेश जारी कर इस श्रेणी को फिर शामिल कर लिया। याचियों ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 34(1) का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी प्रतिष्ठानों में बेंचमार्क दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिए कम से कम चार प्रतिशत पद आरक्षित हैं। इसमें लोकोमोटर दिव्यांगता को एक प्रतिशत आरक्षण की श्रेणी में रखा गया है। सरकार बोली समय पर आपत्ति नहीं की राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि याचियों ने संबंधित शासनादेश के बाद भर्ती प्रक्रिया में भाग लिया था और उस समय कोई आपत्ति नहीं की थी। हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि राज्य की ओर से ऐसा कोई ठोस आधार या सामग्री पेश नहीं की गई, जिससे यह पता चले कि 2021 से 2024 के बीच लेखपाल के काम की प्रकृति में कोई ऐसा बदलाव हुआ था, जिसके कारण लोकोमोटर दिव्यांगता वाले अभ्यर्थियों को आरक्षण से बाहर करना जरूरी हो गया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम की धारा 34(1) के दूसरे प्रावधान के तहत आरक्षण से किसी श्रेणी को बाहर करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अधिसूचना जारी की जानी चाहिए थी, लेकिन राज्य सरकार ने ऐसी कोई अधिसूचना पेश नहीं की। इसलिए 30 जुलाई 2021 का शासनादेश अधिकार क्षेत्र से बाहर जारी किया गया था। कोर्ट ने माना कि लोकोमोटर दिव्यांगता की श्रेणी को हटाने और बाद में बहाल करने के पीछे कोई तर्कसंगत आधार नहीं था और यह सरकार की गलती थी। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि 8085 लेखपाल पदों के एक प्रतिशत के बराबर आरक्षित पदों को पूरा करने के लिए यदि रिक्त पद उपलब्ध हैं तो पात्र पाए गए याचियों को उचित समायोजन के तहत नियुक्ति दी जाए। यदि पर्याप्त रिक्त पद उपलब्ध नहीं हैं तो उनके समायोजन के लिए अतिरिक्त यानी सुपरन्यूमरेरी पद सृजित किए जाएं। कोर्ट ने नियुक्ति प्राधिकारी को आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के छह सप्ताह के भीतर आदेश का अनुपालन करने का निर्देश दिया।
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लेखपाल भर्ती मामले में हाईकोर्ट का फैसला:दिव्यांगता को आरक्षण से बाहर करना सरकार की गलती, नियुक्ति का आदेश