अतुल कुमार सिंह | लखनऊ5 मिनट पहले
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लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में चल रही दो दिवसीय यूपी टेक्स-2026 प्रदर्शनी बुधवार को अंतिम दिन रहा । यहां उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों के पारंपरिक शिल्प के साथ आधुनिक टेक्सटाइल तकनीक की झलक देखने को मिली। बहराइच के किसान शहतूत के पेड़ों पर रेशम के कीड़े पालकर सालाना एक एकड़ में करीब एक लाख रुपए तक कमाई का तरीका बता रहे थे। वहीं बनारस के कारीगर छह हजार से ढाई लाख रुपए तक की बनारसी साड़ियों में मीनाकारी, बूटी और जामदानी की बारीक कारीगरी दिखाया ।
प्रदर्शनी में लखीमपुर खीरी और अमेठी के मूंज शिल्प से जुड़े उत्पाद, कानपुर की कॉटन थ्रेड ज्वेलरी, सीतापुर की हाथ से बुनी दरियां और गाजियाबाद में तैयार हो रही टेक्सटाइल मशीनें आकर्षण का केंद्र रहीं। खास बात यह रही कि यहां सिर्फ कपड़े और हस्तशिल्प नहीं, बल्कि टेक्सटाइल सेक्टर में इस्तेमाल होने वाली मेड इन इंडिया तकनीक भी प्रदर्शित की गई।
1000 डिग्री सेल्सियस में काम करेगा रेस्क्यू सूट
लखनऊ में तैयार किया जा रहा फायर एंट्री सूट प्रदर्शनी में खास आकर्षण रहा। निशीत ने बताया कि पेटेंटेड तकनीक पर आधारित यह सूट 1000 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम करने के लिए तैयार किया गया है। आग के बीच जाकर रेस्क्यू ऑपरेशन में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि भारत में इस तरह के सूट की उपलब्धता अभी सीमित है और इसके लिए विदेशों से आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। अब इसे देश में ही तैयार करने की दिशा में काम किया जा रहा है। जल्द ही फैक्ट्री लगाने की योजना है। सूट का परीक्षण असम में इंडियन ऑयल में भी किया जा चुका है।
1 मिनट में 100 से 120 सैनिटरी पैड
गाजियाबाद की आशित जायसवाल ने सैनिटरी पैड, मैटरनिटी पैड और बेबी डायपर बनाने वाली ऑटोमेटिक मशीन प्रदर्शित की। उन्होंने बताया कि मशीन से फ्लफी, कॉटन, जेल और अल्ट्रा-फ्लफी समेत कई तरह के पैड तैयार किए जा सकते हैं। इसकी उत्पादन क्षमता एक मिनट में 100 से 120 पैड की है।
उनके मुताबिक चीन से आने वाली ऐसी मशीनों की कीमत करीब एक करोड़ रुपए से शुरू होती है, जबकि उनकी कंपनी की मशीन करीब पांच लाख रुपए से शुरू होती है। कम लागत में उत्पादन की क्षमता वाली इस मशीन ने उद्यमियों का ध्यान खींचा।
6 हजार से 2.5 लाख रुपए तक की बनारसी साड़ी
बनारस से आईं सारा ने बताया कि उनकी खासियत बनारसी साड़ी है। इसमें मीनाकारी, बूटी और जामदानी जैसी कई तरह की कारीगरी की जाती है। साड़ियों की कीमत छह हजार रुपए से शुरू होकर ढाई लाख रुपए तक जाती है। कीमत सिल्क की गुणवत्ता, फैब्रिक और उस पर किए गए काम के आधार पर तय होती है। शिफॉन, कतान और कोरा जैसे फैब्रिक पर भी अलग-अलग डिजाइन तैयार किए जाते हैं।
उन्होंने बताया कि कड़वा साड़ी तैयार करने में दो बुनकर लगते हैं। दोनों तरफ से शटल चलने के कारण इसे तैयार करने में अधिक समय लगता है। कटवर्क में अपेक्षाकृत कम समय लगता है, लेकिन हैंड-वीविंग में मेहनत और समय दोनों अधिक लगते हैं। ऐसे में बुनकरों को उनके काम का उचित मूल्य मिलना जरूरी है।
कॉटन थ्रेड से बनाई ज्वेलरी
कानपुर से आईं स्मृति ने कॉटन थ्रेड से तैयार ज्वेलरी प्रदर्शित की। उन्होंने बताया कि यह ज्वेलरी हल्की होने के साथ इको-फ्रेंडली भी है। इसकी कीमत 100 से 300 रुपए तक है।
4 से 5 लाख रुपए से शुरू होती हैं मेड इन इंडिया मशीनें
गाजियाबाद के अजय गोयल ने कॉटन, पॉलिएस्टर, पीपी, नायलॉन, सिल्क और स्टेपल जैसे धागों से डोरियां तैयार करने की तकनीक बताई। उनकी इकाई नैरो वोवन फैब्रिक्स और मैग्नेट टेप भी तैयार करती है। इनके उत्पाद बैग, गार्मेंट और शू इंडस्ट्री में इस्तेमाल होते हैं।
उन्होंने बताया कि भारत में बनी मशीनें अपेक्षाकृत कम कीमत में उपलब्ध हैं और पूरी तरह ऑटोमेटिक हैं। इनकी कीमत करीब चार से पांच लाख रुपए से शुरू होती है। मशीन की कीमत के अनुसार उत्पादन क्षमता और सुविधाएं अलग-अलग होती हैं।
मूंज से थाली, कोस्टर और प्रसाद बॉक्स
अमेठी से आए भवानी प्रसाद निषाद ने मूंज शिल्प के उत्पाद प्रदर्शित किए। उन्होंने बताया कि यह काम ओडीओपी के तहत आता है। मूंज से डाइनिंग टेबल मैट, कोस्टर, थाली और प्रसाद के बॉक्स समेत कई उत्पाद तैयार किए जाते हैं।
उनके मुताबिक सरकार के प्रयास से लंबे समय से छिपी यह पारंपरिक कला फिर आगे बढ़ रही है। करीब एक हजार महिलाएं इस काम से जुड़ी हैं। इससे न सिर्फ महिलाओं को रोजगार मिल रहा है, बल्कि विलुप्त होती कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर भी मिल रहा है।
20 साल से दरी बुन रहे मुरसुद्दीन
सीतापुर से आए मुरसुद्दीन पिछले 20 साल से दरी बनाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि प्लेन दरी एक घंटे में करीब 1 से 1.5 मीटर तक तैयार हो जाती है। डिजाइन वाली दरी में अधिक समय लगता है और एक घंटे में करीब आधा मीटर दरी तैयार होती है।
प्लेन दरी की कीमत करीब 100 से 150 रुपए प्रति मीटर है। उनके कारखाने में पहले 10 खड्डियां लगी थीं। वे कच्चा माल लेकर दरी तैयार करवाते हैं और सीतापुर की हाफिजी आर्ट एंड क्राफ्ट्स को सप्लाई करते हैं। वहां से उत्पादों का एक्सपोर्ट किया जाता है।
ऑटोमेटिक ट्रिमर से उत्पादन 25% तक बढ़ा
कानपुर से आए अनूप दुबे ने ऑटोमेटिक ट्रिमर वाली शिलाई मशीन दिखाई । उन्होंने बताया कि यह सामान्य उत्पादन क्षमता को करीब 25 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। यह मेड इन इंडिया मशीन है और इसके कुछ ही मॉडल अभी बाजार में उपलब्ध हैं।
उन्होंने बताया कि बाजार में चीन, वियतनाम और जापान की मशीनें भी आती हैं, जिनमें सबसे अधिक मशीनें चीन से आती हैं। उनके मुताबिक भारतीय मशीन की क्वालिटी बेहतर है और देश में ही तैयार होने के कारण इसकी कीमत भी प्रतिस्पर्धी है।
शहतूत के पौधों पर रेशम के कीड़े, साल में चार फसल
बहराइच से आए रेशम विभाग के रईस आजाद ने बताया कि जिले में शहतूती रेशम का उत्पादन होता है। विभाग की बीज उत्पादन इकाई से किसानों को रेशम के कीड़ों के उपलब्ध कराए जाते हैं। किसान तकनीकी मार्गदर्शन में अपने खेतों में शहतूत के पौधे लगाकर रेशम का उत्पादन करते हैं।
उन्होंने बताया कि शहतूती रेशम में साल में चार फसलें ली जाती हैं। एक फसल करीब 28 दिन में तैयार हो जाती है। इस तरह एक साल में 28-28 दिन की चार फसलें ली जा सकती हैं। एक एकड़ में इससे किसान को सालाना करीब एक लाख रुपए तक की आमदनी हो सकती है।
पारंपरिक हुनर से आधुनिक टेक्नोलॉजी तक एक मंच
यूपी टेक्स-2026 का आयोजन हथकरघा एवं वस्त्र उद्योग निदेशालय, उत्तर प्रदेश सरकार के सहयोग से किया गया। इसका उद्देश्य प्रदेश के पारंपरिक हस्तशिल्प और हथकरघा उत्पादों के साथ आधुनिक टेक्सटाइल तकनीक को एक मंच पर लाना है। प्रदर्शनी में कारीगरों, उद्यमियों और तकनीकी विशेषज्ञों ने अपने उत्पादों और काम करने के तरीकों की जानकारी साझा की। आयोजन के जरिए उत्तर प्रदेश को वैश्विक टेक्सटाइल हब के रूप में विकसित करने की दिशा में प्रदेश की क्षमता को सामने रखा गया।
