मुसलमान आतंकवादी नहीं…नफरत फैलाने वाले ही आतंकवादी:मौलाना अरशद मदनी बोले-संविधान से सेक्युलर शब्द हटाने की कोशिश, आजादी क्या होती है, ये हमसे पूछो, कुर्बानियां हमने दी


दारुल उलूम देवबंद में जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने देश की आजादी, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को लेकर कई तीखे बयान दिए। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को आतंकवादी बताना और उनके खिलाफ नफरत फैलाना गलत है। मदनी ने कहा-मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं, मुसलमानों को आतंकवादी कहने और नफरत फैलाने वाले सांप्रदायिक लोग ही आतंकवादी हैं। मौलाना मदनी ने अपने संबोधन में उन ताकतों पर भी निशाना साधा, जिन पर उन्होंने देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को कमजोर करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि देश की आजादी और लोकतंत्र महान उपहार हैं और इन्हें कमजोर करने वाली कोशिशों का विरोध किया जाना चाहिए। उन्होंने संविधान से सेक्युलर शब्द हटाने की मांग या कोशिशों को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि सांप्रदायिक ताकतें देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बदलना चाहती हैं। आजादी क्या होती है, यह हमसे पूछो स्वतंत्रता संग्राम में मुसलमानों, उलेमा और मदरसों की भूमिका का उल्लेख करते हुए मौलाना मदनी ने कहा-आजादी क्या होती है, यह हमसे पूछो, कुर्बानियां हमने दी हैं। उन्होंने कहा कि भारत की स्वतंत्रता का इतिहास दारुल उलूम देवबंद, उलेमा, मदरसों और मुसलमानों की कुर्बानियों के उल्लेख के बिना न तो पूरा लिखा जा सकता है और न ही सही मायने में समझा जा सकता है। मदनी के मुताबिक दारुल उलूम देवबंद की स्थापना 1866 में ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों को तैयार करने के उद्देश्य से हुई थी, जो अंग्रेजी शासन से देश को मुक्त कराने के लिए संघर्ष करें। उन्होंने आरोप लगाया कि आज इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है और उन्हीं मदरसों को आतंकवाद से जोड़ने की कोशिश की जा रही है, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका निभाई थी। रेशमी रूमाल आंदोलन और माल्टा की कैद का जिक्र मौलाना अरशद मदनी ने रेशमी रूमाल आंदोलन और माल्टा की कैद को स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण घटनाएं बताते हुए कहा कि इन अध्यायों को कोई सांप्रदायिक ताकत इतिहास से मिटा नहीं सकती। उन्होंने शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन देवबंदी, शेखुल इस्लाम मौलाना हुसैन अहमद मदनी और उनके साथियों का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें भारत को ब्रिटिश गुलामी से आजाद कराने के प्रयासों के कारण माल्टा में कैद किया गया था। मदनी ने सवाल उठाया कि जब उनके बुजुर्ग माल्टा में कैद थे, उलेमा अंग्रेजों के खिलाफ जेलें भर रहे थे और देश की आजादी के लिए जानें कुर्बान कर रहे थे, तब आज देशभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने वालों के वैचारिक पूर्वज कहां थे? उन्होंने कहा कि मुसलमानों और मदरसों से देशभक्ति का प्रमाण मांगने से पहले ऐसे लोगों को इतिहास के आईने में अपना अतीत देखना चाहिए। पहले मुसलमान निशाने पर थे, अब इस्लाम भी निशाने पर मदनी ने कहा कि ऐसा नहीं है कि पूर्ववर्ती सत्ता में रहे लोग मौजूदा हालात के लिए जिम्मेदार नहीं थे। उनके अनुसार, अलग-अलग दौर में मुसलमानों को सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाने की कोशिशें होती रही हैं और मुस्लिम विरोधी दंगे भी हुए हैं। हालांकि उन्होंने वर्तमान और पुराने हालात में अंतर बताते हुए कहा कि पहले मुसलमान निशाने पर थे, लेकिन अब इस्लाम भी निशाने पर है। मौलाना मदनी ने कहा कि इस्लाम को मिटाने की कोशिश करने वाले खुद मिट गए। सोवियत रूस का उदाहरण देकर कही बड़ी बात अपने भाषण में मौलाना मदनी ने सोवियत रूस का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि वहां लंबे समय तक कम्युनिज्म को बढ़ावा देकर इस्लाम को खत्म करने की कोशिश की गई। उनके मुताबिक मस्जिदों और धार्मिक मदरसों पर पाबंदियां लगाई गईं और वर्षों तक मस्जिदों से अजान की आवाज सुनाई नहीं दी। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद सोवियत रूस का विघटन हुआ और उसके बाद कई मुस्लिम देश अस्तित्व में आए। मदनी ने दावा किया कि तमाम जुल्म और बर्बरता के बावजूद इस्लाम और मुसलमान कायम रहे। हिंदू राजा महेंद्र प्रताप का भी किया जिक्र मौलाना मदनी ने आजादी से पहले काबुल में बनी निर्वासित सरकार और हिंदू राजा महेंद्र प्रताप का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें राष्ट्रपति बनाकर भारत के स्वतंत्रता सेनानियों ने उस दौर में ही सेक्युलरिज्म का संदेश दिया था। उन्होंने कहा कि आज जब देश में धर्मनिरपेक्षता को लेकर बहस चल रही है और संविधान से सेक्युलर शब्द हटाने की बातें सामने आती हैं, तब आजादी के आंदोलन के उस इतिहास को याद किया जाना चाहिए, जिसमें अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोगों ने मिलकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया।

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