कैसरबाग में 'सावन की बहार' उत्सव:लोकगीत, पकवान और शिल्प से सजी अवध की परंपराएं


सावन की फुहार, लोकगीतों की मिठास और पारंपरिक पकवानों की खुशबू रविवार को कैसरबाग में एक साथ नजर आई। लखनऊ बायोस्कोप, सनतकदा और नैमतखाना की ओर से जेसी बोस मार्ग पर ‘सावन की बहार’ उत्सव आयोजित किया गया। अवध में सावन सिर्फ मौसम बदलने का नाम नहीं है। इसके साथ मेहंदी, फूलों का श्रृंगार, झूले, लोकगीत, किस्से और खास पकवानों की परंपरा भी जुड़ी है। उत्सव में इन्हीं परंपराओं को एक जगह सहेजने की कोशिश की गई।कार्यक्रम की शुरुआत लेहरिया दुपट्टे और फूलों के आभूषण बनाने की क्राफ्ट डेमोंस्ट्रेशन से हुई। लोगों ने मौसमी शिल्प को करीब से देखा और इनके पीछे छिपे पारंपरिक हुनर को समझा। अवधी लेहरिया की खासियत भी लोगों को बताई गई। इसमें रंगे हुए सूती फीते यानी ‘फिते’ कपड़े पर लगाकर रंगों की नरम और बहती धारियां बनाई जाती हैं। लखनऊ के संयुक्त परिवारों में महिलाएं मिलकर दुपट्टे रंगती और उन्हें गोटा, कामदानी व फरदी से सजाती थीं। ऐसे दुपट्टे त्योहारों और खुशियों में एक-दूसरे को भेंट किए जाते थे। गीतों और किस्सों में उतरा सावन शाम को ‘झूला किन्ने डारा : सावन के गीत और कहानियां’ प्रस्तुति हुई। ढोलक रानी की ओर से पेश कार्यक्रम में गंगा-जमुनी क्षेत्र के सावन गीतों और किस्सागोई की परंपरा को मंच पर जीवंत किया गया। गायिका शिवांगिनी येशु युवराज, सूत्रधार व कहानीकार ईशा प्रिया सिंह, तबले पर शिवर्ग भट्टाचार्य और कथावाचन में दिनकर द्विवेदी ने प्रस्तुति दी। गीत, कहानी और शास्त्रीय संगीत के मेल ने दर्शकों को सावन की लोक परंपराओं से जोड़ा। प्रस्तुति में ‘झिर झिर’, ‘सावन की घिर आई’, ‘झूला किन्ने डारा’, ‘रंगीले हिंडोरे’, ‘सिया संग’, ‘अरे रामा-टूटे सड़किया’ और ‘बादल के नाहीं’ जैसे गीत शामिल रहे। थाली में भी दिखा सावन का स्वाद उत्सव में नैमतखाना का खास सावन मेन्यू भी आकर्षण रहा। इसमें बाजरे की टिकिया के साथ बैंगन चोखा, कद्दू-पूरी, अरवी के पत्ते के साथ फुल्का, पनीर पालक के साथ फुल्का, बिरहाई, अचार और शीर क़ोरमा परोसा गया। इस तरह पूरे दिन चले उत्सव में अवध का सावन सिर्फ देखा और सुना ही नहीं गया, बल्कि उसके पारंपरिक स्वाद को भी महसूस किया गया।

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