अंजान शहर में दोस्त की बेटी का कराया रेस्क्यू:पूर्व डीजीपी ओपी सिंह ने अपनी किताब "थ्रू माई आइज़" के अध्याय को किया साझा


उत्तर प्रदेश के डीजीपी रह चुके ओम प्रकाश सिंह 1982 बैच के आईपीएस आफिसर हैं। वे 23 जनवरी 2018 से 31 जनवरी 2020 तक उत्तर प्रदेश के डीजीपी रहे। रिटायर होने के बाद वे अब दिल्ली में रह रहे हैं। उन्होंने अपनी सर्विस के दौरान के किस्से अपनी किताब “थ्रू माई आईज़” में समेटा है। जिस घटना का जिक्र हम करने जा रहे हैं वह हू ब हू वैसी है, जैसी उन्होंने अपनी किताब में लिखी है। ओपी सिंह लिखते हैं कि प्रयागराज में शांति हमेशा एक नाज़ुक डोर की तरह रही है, जो विभिन्न समुदायों के बीच बड़ी मुश्किल से संतुलित रहती थी। पुलिस और प्रशासन सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए निरंतर सतर्क रहते थे और तनाव की हल्की-सी आहट पर भी तत्काल हस्तक्षेप करते थे। छोटी-सी घटना भी बड़े दंगे का रूप ले सकती थी। केवल सतत निगरानी, त्वरित कार्रवाई और समाज के सजग नागरिकों के सहयोग से ही शहर में स्थिरता बनी रहती थी। मुझे 1980 के दशक के उत्तरार्ध की एक घटना याद आती है। कोतवाली थाना क्षेत्र के बहादुरगंज इलाके में एक मामूली विवाद अचानक उग्र होने लगा। दोनों पक्षों के लोग बड़ी संख्या में इकट्ठा हो गए और माहौल तेजी से हिंसा की ओर बढ़ने लगा। समय रहते पुलिस और जिला प्रशासन ने हस्तक्षेप किया और स्थिति को नियंत्रण में कर लिया। ऐसे तनाव उस समय असामान्य नहीं थे। दशहरा, ईद या होली—हर त्योहार के साथ कहीं-न-कहीं अशांति की आशंका बनी रहती थी। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए विभिन्न मोहल्लों में शांति समितियों का गठन किया गया था। इनमें समाज के सम्मानित नागरिक शामिल होते थे, जो लोगों से शांति बनाए रखने की अपील करते और विवादों को प्रारम्भ होने से पहले ही समाप्त करने का प्रयास करते। ये समितियाँ नियमित बैठकें करती थीं और लोगों को यह संदेश देती थीं कि सभी त्योहार आपसी सौहार्द के साथ मनाए जाएँ, क्योंकि यह शहर सबका है। इन प्रयासों में कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। सुनीत व्यास, जो सिटीज़न्स वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष थे, अपने प्रभाव का उपयोग संवाद बनाए रखने में करते थे। प्रसिद्ध पत्रकार और उपन्यासकार रवीन्द्र कालिया अपनी लेखनी के माध्यम से समाज को जोड़ने का कार्य करते थे। वहीं कवि और सिविल डिफेंस के डिवीजनल वार्डन ज़ेड. एच. काज़मी तनाव के समय विवेक और संतुलन की आवाज़ बनकर उभरते थे। विशेष रूप से काज़मी साहब ने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी। शहर की शांति के प्रति उनकी गंभीर चिंता, उनके संतुलित शब्द और अत्यंत तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी लोगों को शांत कर देने की उनकी क्षमता उन्हें विशिष्ट बनाती थी। समय के साथ मेरा इन सभी लोगों, विशेषकर काज़मी साहब, से घनिष्ठ संबंध बन गया। लेकिन जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। प्रयागराज में दो वर्ष बिताने के बाद मेरा स्थानांतरण हो गया। धीरे-धीरे वे निकट संबंध भी स्मृतियों का हिस्सा बन गए। कभी-कभार फोन पर बातचीत हो जाती थी, लेकिन वह भी समय के साथ कम होती गई। प्रयागराज और वहाँ की चिंताएँ अब केवल यादें रह गई थीं। वर्ष बीत गए। वर्ष 2002 में मैं केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) में प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली मुख्यालय में डीआईजी के रूप में कार्यरत था। नई जिम्मेदारियाँ, नए लोग और केंद्रीय सेवा की व्यस्त दिनचर्या ने जीवन को पूरी तरह बदल दिया था। अतीत की वे पहचानें अब धुंधली पड़ चुकी थीं। फिर एक रात, लगभग एक या दो बजे, मेरे घर के लैंडलाइन फोन की तेज़ घंटी ने मुझे नींद से जगा दिया। अँधेरे कमरे में बिस्तर के पास रखा वह छोटा-सा टेलीफोन किसी अनिष्ट का संकेत देता हुआ प्रतीत हो रहा था। उनींदी अवस्था में मैंने रिसीवर उठाया और मन ही मन सोचने लगा कि इतनी रात गए कौन फोन कर सकता है। दूसरी ओर से एक काँपती हुई, संकोच और घबराहट से भरी आवाज़ सुनाई दी। उसके स्वर में ऐसी बेचैनी थी जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता था। “क्या आप वही आईपीएस अधिकारी हैं जो अस्सी के दशक के अंत में प्रयागराज में तैनात थे?” उसने पूछा। आवाज़ जानी-पहचानी लग रही थी, पर वर्षों की दूरी ने स्मृतियों पर धुंध डाल दी थी। फिर भी उसके बोलने के अंदाज़ ने मेरे मन के किसी कोने को छू लिया। अचानक मुझे याद आया—वह ज़ेड. एच. काज़मी थे। हमारी वर्षों से कोई बातचीत नहीं हुई थी। समय ने हमारी सहज मित्रता को मानो कहीं पीछे छोड़ दिया था। लेकिन आज, आधी रात को, वे मुझे अत्यंत व्याकुल होकर फोन कर रहे थे। उन्होंने पहले यह बताया कि मुझे खोजने में उन्हें कितनी कठिनाई हुई। उन्होंने उत्तर प्रदेश के अनेक स्थानों पर पूछताछ की, एक के बाद एक सूत्रों का पीछा किया और अंततः मेरे वर्तमान पदस्थापन का पता लगा सके। उनकी यह अथक कोशिश ही बता रही थी कि मामला अत्यंत गंभीर था। फिर भावनाओं से भरे स्वर में उन्होंने अपनी व्यथा सुनाई। कुछ ही दिन पहले उनकी बेटी का विवाह हुआ था और वह अपने ससुराल अहमदाबाद चली गई थी। तभी शहर सांप्रदायिक दंगों की चपेट में आ गया। जिस इलाके में उसका घर था, वही हिंसा का केंद्र बन गया। पूरा मोहल्ला भय से जकड़ा हुआ था। उनकी बेटी और उसके ससुराल वाले घर के भीतर फँसे हुए थे। बाहर निकलने का साहस किसी में नहीं था। जो शहर उसके नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक होना चाहिए था, वही भय और आतंक का पर्याय बन चुका था। प्रयागराज में बैठे काज़मी साहब ने हर संभव प्रयास कर लिया था। उन्होंने स्थानीय अधिकारियों से संपर्क किया, परिचितों से मदद माँगी, लेकिन कोई रास्ता नहीं निकला। अंततः उन्हें प्रयागराज के वे दिन याद आए जब हम दोनों ने मिलकर शहर में शांति बनाए रखने का प्रयास किया था। उसी विश्वास के सहारे उन्होंने मुझे फोन किया। उनकी आवाज़ बार-बार भर्रा रही थी। अब वे किसी कवि या समाजसेवी की तरह नहीं, बल्कि एक असहाय पिता की तरह बोल रहे थे। उन्हें इस बात की परवाह नहीं थी कि वे मुझसे लगभग असंभव सहायता माँग रहे हैं। उन्हें केवल इतना विश्वास था कि मैं कभी उनका विश्वसनीय साथी रहा हूँ और इस कठिन घड़ी में वही विश्वास उनका अंतिम सहारा था। मैं अँधेरे कमरे में रिसीवर थामे बैठा रहा। मन में अनेक प्रश्न उठ रहे थे। वर्षों से जिसका मुझसे कोई संपर्क नहीं था, वह संकट की इस घड़ी में मुझ तक क्यों पहुँचा? उसे यह विश्वास कैसे हुआ कि मैं सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठकर भी उसकी सहायता कर सकता हूँ? लेकिन उनकी पीड़ा सुनने के बाद ये सारे प्रश्न महत्वहीन हो गए। मैंने तुरंत अपनी फोर्स के एक अधिकारी से संपर्क किया, जो उस समय अहमदाबाद में स्थिति नियंत्रित करने में लगे थे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में बताया कि पूरा इलाका कर्फ्यू के अधीन है। नागरिकों की आवाजाही पूरी तरह बंद है और परिवार को वहाँ से निकालना अत्यंत जोखिमपूर्ण होगा। विशेष रूप से वाहन से निकलना जानलेवा साबित हो सकता था। एक पुलिस अधिकारी होने के नाते मैं जानता था कि ऐसा अभियान कितना खतरनाक होगा। लेकिन दूसरी ओर एक ऐसा पिता था जो अपनी बेटी को भय के बीच असहाय छोड़ देने को तैयार नहीं था। मैंने उस अधिकारी से आग्रह किया कि कम-से-कम काज़मी साहब की बेटी को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाने का प्रयास किया जाए। यह निश्चित रूप से जोखिम भरा निर्णय था, पर मैंने यह भी सोचा कि यदि उसे वहीं छोड़ दिया गया तो उसका मानसिक आघात कहीं अधिक गंभीर होगा। पहले तो अधिकारी ने संकोच किया, लेकिन अंततः वह तैयार हो गया। अत्यंत सावधानी और सूझबूझ के साथ, चारों ओर फैली हिंसा के बीच, उसने अपनी गाड़ी से काज़मी साहब की बेटी को वहाँ से निकाला। हर मोड़ पर खतरा था, हर सड़क अनिश्चित थी, लेकिन उसने अदम्य साहस और दृढ़ निश्चय के साथ यह दायित्व निभाया। उस अभियान का प्रत्येक क्षण मुझे अनंत प्रतीत हो रहा था। मैं बेचैनी से किसी समाचार की प्रतीक्षा करता रहा। अंततः संदेश मिला—वह सुरक्षित स्थान पर पहुँच गई थी। मैंने फोन रखा, लेकिन हृदय की धड़कनें अभी भी तेज़ थीं। रात फिर से शांत हो गई थी, पर मुझे पता था कि काज़मी साहब के मन का भारी बोझ उतर चुका था। अपने सबसे कठिन समय में उन्होंने मुझ पर विश्वास किया था, और सौभाग्य से मैं उस विश्वास पर खरा उतर सका। उस रात के बाद मेरी काज़मी साहब से फिर कभी मुलाकात नहीं हुई। लेकिन उनकी आवाज़—जिसमें निराशा भी थी और कृतज्ञता भी—आज तक मेरे मन में गूँजती है। उसने मुझे यह सिखाया कि एक बार अर्जित किया गया विश्वास कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। कभी-कभी वर्षों और दूरियों के बाद संकट की एक पुकार फिर से रिश्तों को जीवित कर देती है, और वही एक क्षण किसी जीवन की दिशा बदल देता है।

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