प्रयागराज में ही राहुल की ‘छात्रों से संवाद’ क्यों:शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं का बड़ा केंद्र; एक्सपर्ट बोले- पूर्वांचल के युवाओं को साध गए


राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के लिए उत्तर प्रदेश में प्रयागराज का चयन सियासी तौर पर चर्चा में है। कांग्रेस इसे शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के बड़े केंद्र के तौर पर प्रयागराज की पहचान से जोड़ रही है। वहीं राजनीतिक विशेषज्ञ इसे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले युवाओं के बीच कांग्रेस की पकड़ मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं। उनका कहना है कि प्रयागराज में कार्यक्रम करने का असर सिर्फ शहर तक सीमित नहीं रहेगा, क्योंकि यहां पूर्वांचल समेत प्रदेश के अलग-अलग जिलों से बड़ी संख्या में छात्र पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं। कांग्रेसी बोले- शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं का बड़ा केंद्र कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के मुताबिक प्रयागराज उत्तर प्रदेश में लंबे समय से शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां इलाहाबाद विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग और उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद जैसे महत्वपूर्ण संस्थान हैं। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों, खासकर पूर्वांचल के जिलों से बड़ी संख्या में छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए प्रयागराज आते हैं। ऐसे में छात्रों के बीच होने वाला कोई भी बड़ा संवाद सिर्फ स्थानीय युवाओं तक सीमित नहीं रहता। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में ‘छात्रों की गूंज’ जैसे कार्यक्रम के लिए प्रयागराज को चुना गया। पार्टी की नजर यहां रहने वाले स्थानीय छात्रों के साथ उन युवाओं पर भी है, जो दूसरे जिलों से आकर पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। एक शहर से कई जिलों तक संदेश पहुंचाने की रणनीति राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक, प्रयागराज की सबसे बड़ी खासियत उसका शैक्षणिक प्रभाव क्षेत्र है। पूर्वांचल के कई जिलों से छात्र यहां आकर पढ़ते हैं। इनमें बड़ी संख्या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं की होती है। ऐसे में प्रयागराज में होने वाला छात्र संवाद स्वाभाविक रूप से आसपास के जिलों और वहां के युवाओं तक राजनीतिक संदेश पहुंचाने का माध्यम बन सकता है। एक्सपर्ट मानते हैं कि कांग्रेस के लिए यह ऐसा मंच है, जहां एक कार्यक्रम के जरिए अलग-अलग जिलों से जुड़े युवाओं तक पहुंच बनाई जा सकती है। कार्यक्रम कितना सफल रहा? कांग्रेस और भाजपा के अलग-अलग दावे ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम की सफलता को लेकर कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के दावे अलग-अलग हैं। कांग्रेस का कहना है कि तमाम व्यवधानों के बावजूद कार्यक्रम में करीब 80 हजार से एक लाख छात्रों ने हिस्सा लिया। पार्टी नेताओं का तर्क है कि यह कोई पारंपरिक रैली या चुनावी सभा नहीं थी, इसके बावजूद इतनी बड़ी संख्या में युवाओं की मौजूदगी कार्यक्रम की सफलता दिखाती है। वहीं भाजपा नेताओं ने कार्यक्रम को फ्लॉप शो बताया। कैबिनेट मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी ने दावा किया कि तीन लाख छात्रों के आने के दावों के उलट कार्यक्रम में करीब 8 से 10 हजार लोग ही पहुंचे। उन्होंने पंडाल पर तीन करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च होने और करीब 10 लाख रुपए की आतिशबाजी किए जाने का भी दावा किया। नंदी ने यह भी कहा कि कार्यक्रम में पहुंचे लोगों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी, जो सिंगर को सुनने और आतिशबाजी देखने पहुंचे थे। भाजपा के इन दावों पर कांग्रेस नेता हसीब अहमद ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि नंदी का बयान उनकी ‘फ्रस्टेशन’ को दिखाता है और इस तरह के बयान देकर वह छात्रों का अपमान कर रहे हैं। अब राजनीतिक विशेषज्ञों की नजर से समझिए रणनीति कांग्रेस के दावों और भाजपा के आरोप-प्रत्यारोप से अलग राजनीतिक विशेषज्ञ इस कार्यक्रम को व्यापक राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखते हैं। उनके मुताबिक उत्तर प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव ज्यादा दूर नहीं है। ऐसे में कांग्रेस के सामने संगठन को मजबूत करने के साथ-साथ युवा मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने की चुनौती है। युवा आबादी के बीच शिक्षा, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दे लगातार चर्चा में रहते हैं। कांग्रेस इन्हीं मुद्दों को अपने राजनीतिक अभियान का आधार बनाकर युवाओं से सीधा संवाद स्थापित करने की कोशिश कर रही है। युवाओं की नाराजगी को राजनीतिक समर्थन में बदलने की कोशिश? राजनीतिक विश्लेषक सुनील शुक्ला के मुताबिक मौजूदा समय में जेन-जी के एक हिस्से में शिक्षा, रोजगार और सरकारी व्यवस्था को लेकर नाराजगी है। प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी, पेपर लीक, भर्ती प्रक्रिया में देरी और रोजगार के अवसरों की कमी जैसे मुद्दे सीधे युवाओं को प्रभावित करते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक कांग्रेस इन मुद्दों को उठाकर युवाओं में मौजूद असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलने की कोशिश कर रही है। इसके लिए पार्टी सिर्फ चुनाव के समय अभियान चलाने के बजाय लगातार छात्रों और युवाओं के बीच पहुंच बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी और कांग्रेस की सक्रियता को भी इसी रणनीति की एक कड़ी के तौर पर देखा गया। पार्टी लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह शिक्षा, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर छात्रों और युवाओं के साथ खड़ी है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों? राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक राष्ट्रीय राजनीति में उत्तर प्रदेश की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में है। लोकसभा में सबसे ज्यादा सीटें इसी राज्य से आती हैं। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए उत्तर प्रदेश में मजबूत जनाधार बनाना कांग्रेस के लिए जरूरी है। कांग्रेस लंबे समय से प्रदेश में अपने संगठन और जनाधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में युवाओं को अपने राजनीतिक अभियान से जोड़ना पार्टी के लिए अहम हो सकता है। छात्र संवाद इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राहुल गांधी खुद क्यों कर रहे युवाओं से संवाद? राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक राहुल गांधी खुद इस तरह के अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं, क्योंकि कांग्रेस युवाओं के बीच उनकी सीधी पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है। छात्रों से सीधे संवाद करना, उनके सवाल सुनना और शिक्षा, बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं तथा भर्ती प्रक्रिया जैसे मुद्दों को मंच देना राहुल गांधी की उस राजनीतिक छवि को मजबूत करने की कोशिश है, जिसमें उन्हें युवाओं से जुड़े सवालों को प्रमुखता देने वाले नेता के तौर पर पेश किया जा रहा है। कांग्रेस के सामने चुनौती सिर्फ भीड़ जुटाने की नहीं हालांकि राजनीतिक तौर पर ऐसे कार्यक्रम की सफलता का आकलन सिर्फ भीड़ के आधार पर नहीं होगा। कांग्रेस के सामने असली चुनौती कार्यक्रम में जुटे युवाओं को लंबे समय तक अपने राजनीतिक अभियान से जोड़ने की है। प्रयागराज जैसे शहर में छात्र संवाद के जरिए पूर्वांचल के युवाओं तक पहुंच बनाने की कोशिश तभी राजनीतिक रूप से प्रभावी मानी जाएगी, जब पार्टी इन मुद्दों को लगातार उठाए और उन्हें संगठन से जोड़ सके। यही वजह है कि ‘छात्रों की गूंज’ को कांग्रेस के लिए सिर्फ एक कार्यक्रम के बजाय युवा वोटरों के बीच लंबी राजनीतिक रणनीति की शुरुआत के तौर पर भी देखा जा रहा है।

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