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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने प्रदेश में निराश्रित गोवंश आश्रय स्थलों के संचालन को लेकर राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। न्यायालय ने वर्ष 2019 की सरकारी नीति पर सवाल उठाते हुए पूछा कि जब गोवंश आश्रय स्थलों की स्थापना, संचालन और प्रबंधन की जिम्मेदारी स्थानीय निकायों की है, तो पशुपालन विभाग सीधे स्वयंसेवी संस्थाओं (एनजीओ) से आवेदन क्यों ले रहा है? न्यायालय ने अपर मुख्य सचिव, पशुपालन विभाग को इस पूरे मामले की समीक्षा कर रिपोर्ट मुख्य सचिव के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। साथ ही कहा है कि सरकार स्पष्ट करे कि मौजूदा नीति का पालन किस प्राधिकरण के माध्यम से और किस प्रक्रिया के तहत किया जाएगा। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने यह आदेश राजेश कुमार की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। याचिका में कहा गया था कि पशुपालन निदेशक ने प्रदेश के सभी मुख्य पशु चिकित्साधिकारियों को सीधे एनजीओ से प्राप्त आवेदनों के आधार पर गोवंश आश्रय स्थलों के संचालन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। इससे ग्राम पंचायतों, नगर पंचायतों, नगर पालिकाओं और नगर निगमों की वैधानिक भूमिका समाप्त हो रही है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने 2 जनवरी और 28 जनवरी 2019 के शासनादेशों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन आदेशों में स्थानीय निकायों को ही गोवंश आश्रय स्थलों की स्थापना, संचालन और प्रबंधन का अधिकार दिया गया है। यदि आवश्यकता हो तो वे एनजीओ या सीएसआर के तहत कार्य करने वाली कंपनियों का सहयोग ले सकते हैं, लेकिन पूरी प्रक्रिया स्थानीय निकायों की देखरेख में ही होनी चाहिए। न्यायालय ने राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत निर्देशों का परीक्षण करने के बाद प्रथम दृष्टया पाया कि हाल ही में अपर मुख्य सचिव, पशुपालन विभाग द्वारा जारी आदेश भी वर्ष 2019 की मूल नीति से मेल नहीं खाता। कोर्ट ने कहा कि चूंकि मूल नीति मुख्य सचिव के स्तर से जारी की गई थी, इसलिए उसके क्रियान्वयन को लेकर पैदा हुए भ्रम और विसंगतियों का समाधान भी मुख्य सचिव के स्तर पर ही किया जाना चाहिए।
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गोवंश आश्रय संचालन पर हाईकोर्ट ने मांगा जवाब:सरकार से पूछा- एनजीओ से आवेदन क्यों ले रहा पशुपालन विभाग