लैंसेट की स्टडी; कुपोषण का दोहरा बोझ:बचपन में दुबले, पर 9 साल की उम्र में मोटे हो रहे कई बच्चे


भारत में बच्चों के कुपोषण की तस्वीर बदल रही है। चुनौती अब सिर्फ भोजन की कमी तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह कुपोषण और मोटापे के दोहरे बोझ में बदल रही है। एक ताजा स्टडी के मुताबिक अब एक ही बच्चा बचपन में पहले दुबलापन और कुछ ही वर्षों बाद मोटापे का शिकार हो रहा है। इसे वैज्ञानिक ‘डबल बर्डन ऑफ मालन्यूट्रिशन’ यानी कुपोषण के दोहरे बोझ के रूप में देख रहे हैं। क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज (सीएमसी) वेल्लोर और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए गए और द लैंसेट रीजनल हेल्थ-साउथ ईस्ट एशिया में प्रकाशित एक नए अध्ययन में कुछ बच्चों को जन्म से नौ वर्षों तक ट्रैक किया गया। इस स्टडी में शामिल बच्चों में पाया गया कि अधिकांश का बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) उनके पहले पांच वर्षों के दौरान सेहतमंद स्तर पर था। सात साल की उम्र में करीब 26% बच्चे दुबले थे, जबकि 5.2% अधिक वजन या मोटापे का शिकार थे। नौ साल तक पहुंचते-पहुंचते मोटापा और अधिक वजन करीब 3 गुना बढ़कर 14.6% हो गया, जबकि करीब 21.6% बच्चे अब भी कम वजन के या दुबले रहे। 5 साल तक के बच्चों में घट रहा कुपोषण – सरकारी डेटा सरकार द्वारा पोषण ट्रैकर के जरिए 7.7 करोड़ से ज्यादा बच्चों को ट्रैक किया जाता है। इसके मुताबिक बीते 3 वर्षों में कुपोषण की स्थिति में सुधार हुआ है। 0-5 वर्ष की आयु के 63 लाख बच्चों की ट्रैकिंग के आधार पर बौनापन, कम वजन के मामले घटे हैं। स्थिति मई 23 मई 26
बौनापन 38% 30%
कम वजन 18% 12%
कुपोषण 07% 03%
(स्रोत- पोषण ट्रैकर) पोषण – भोजन की कमी नहीं, गुणवत्ता-प्रोसेस्ड फूड चुनौती सीएमसी वेल्लोर की बीना कोशी के मुताबिक, ‘देश में पोषण की चुनौती अब केवल भोजन की कमी नहीं रही। भोजन की गुणवत्ता, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, कम शारीरिक गतिविधि और गर्भावस्था में मां की सेहत भी चुनौती है।’ ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट के अनुसार, भारत में पांच साल से कम उम्र के करीब 30% बच्चे ठिगने हैं और 17.3% बच्चे लंबाई के अनुपात में कम वजन से प्रभावित हैं। ये एशिया के औसत से ज्यादा है।

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