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इमाम हुसैन और उनके साथियों को करबला के मैदान में उस वक्त के आतंकवादी यजीद की सेना ने तीन दिन का भूखा प्यासा शहीद किया था। 1400 साल पहले यह वाक्य इस्लामिक कैलेंडर के मोहर्रम माह की 10 तारीख को हुआ था। तब से आज तक इमाम हुसैन की शहादत याद की जाती है। इसी क्रम में उनकी शहादत के दूसरे दिन तीजे का जुलूस निकाला गया। वाराणसी में गूंजा या हुसैन इमाम हुसैन की शहादत के दूसरे दिन वाराणसी के कई इलाकों से इमाम के तीजे पर अलम का जुलूस निकाला गया। जिसमें आगे या हुसैन की सदा लगाते युवा चल रहे थे। वहीं फन ए सिपाहगिरी (अखाड़े) का भी प्रदर्शन किया जा रहा था। पुलिस की गाइडलाइन के अनुरूप यह जुलूस निकाला गया। ज्यादातर जुलूस दरगाह फातमान, लल्लापुरा और सदर इमामबाड़ा, लाट सरैया पर समाप्त हुए । दालमंडी से भी तीजे के कई जुलूस उठाए गए जो दरगाह फातमान तक गए। इस दौरान या हुसैन की सदा गूंजती रही। इन इलाकों से उठाया गया जुलूस 12 मोहर्रम को शहर के अर्दली बाजार, नदेसर, राजाबाजार, दालमंडी, हड़हासराय, बेनियाबाग, राजादरवाजा, चहमामा, नई सड़क, मदनपुरा, रेवड़ी तालाब, रामापुरा, गौरीगंज, शिवाला, लंका, छित्तूपुर, सुंदरपुर, मंडुआडीह, लहरतारा, औरंगबाद, पितृकुण्डा, लल्लापुरा, लहंगपुरा, माताकुण्ड, नक्खास, मैदागिन, औसानगंज, जैतपुरा, कोयला बाजार, चौहटा, पठानी टोला, पीलीकोठी, आजाद पार्क, आदि मुस्लिम बहुल इलाकों से अलम के जुलूस निकाले गए। फन ए सिपाहगिरी देखने उमड़े लोग अखाड़ों का हुआ प्रदर्शन इस दौरान सभी अखाड़ों ने फन ए सिपाहगीरी का प्रदर्शन किया और सड़क पर हैरतअंगेज करतब दिखाए। आग के गोले से निकलना और एक दूसरे के साथ जंग कर कर्बला की जंग को ताजा किया। जुलूस देर शाम तक कर्बला पहुंचता रहा और ठंडा होता रहा। सर्वाधिक जुलूस फातमान स्थित सुन्नी कब्रिस्तान में पहुंचकर ठंडे हुए।
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इमाम हुसैन के तीजे पर निकले अलम और अखाड़े:वाराणसी की फिजा में गूंजी सदा ए या हुसैन, करबला को किया याद