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लखनऊ में शनिवार देर रात यौम-ए-आशूर के दूसरे दिन ग्यारह मुहर्रम की मजलिस हुई। इस दौरान फिजा एक बार फिर गम-ए-हुसैन में डूब गई। सआदतगंज स्थित रौजा-ए-फातमैन से दरगाह हजरत अब्बास तक मंजर-ए-कर्बला का जुलूस निकाला गया। जुलूस में शामिल अजादारों की आंखें नम थीं । हाय हुसैन , या हुसैन, लब्बैक या हुसैन की चारों पर गूंज थी। देर रात आंधी और बारिश के बीच शिया धर्म गुरु मौलाना कल्बे जवाद ने इमामबाड़ा गुफरान मआब में मजलिस पढ़ी। मौलाना ने प्यास का मंजर बयान किया। उन्होंने कहा कि सिर पर मिट्टी के खाली कूजे उठाए मासूम बच्चों की पुकार ने कर्बला के तपते रेगिस्तान में प्यास से तड़पते हुसैनी खेमे बहुत याद आते हैं। खासकर जनाबे सकीना और हजरत अली असगर की दर्दनाक प्यास का मंजर कभी भुलाया नहीं जा सकता। यह दृश्य सुनकर अजादार अपने आंसू नहीं रोक सके। मौलाना ने कहा कि हजरत इमाम हुसैन का महान व्यक्तित्व हजरत अली की शिक्षा का परिणाम है । पैगम्बर मोहम्मद साहब ने मैदान-ए-ग़दीर के अवसर पर सवा लाख हाजियों के सामने विलायते अली की घोषणा किया था । मौलाना ने कहा कि हजरत अली ने लोगों को शिक्षा हासिल करने के लिए प्रेरणा दिया । हमेशा मानव भलाई का संदेश दिया। उनके दोनों पुत्र हजरत इमाम हसन और हजरत इमाम हुसैन ने अपने जीवन में इसे लागू किया। अंजुमन जलाउल ईमान की ओर से आयोजित मजलिस को मौलाना सैफ अब्बास नकवी ने खिताब करते हुए कहा कि कर्बला इंसानियत, सब्र, हक और इंसाफ की सबसे बड़ी मिसाल है। वहीं, दरगाह हजरत अब्बास और इमामबाड़ा मीरन साहब में ग्यारह मुहर्रम पर अजादारों ने जंजीर, छुरी और कमा का मातम कर अपने खून का पुरसा दिया। या हुसैन की सदाओं और दर्द भरे नौहों के बीच मातम का सिलसिला देर रात तक चलता रहा।
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लखनऊ में बारिश के बीच हुई मजलिस:मौलाना कल्बे जवाद ने कर्बला के प्यास का मंजर बयान किया, या हुसैन की सदा के साथ लोगों ने किया मातम