नई दिल्ली5 मिनट पहले
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को I-PAC के ऑफिस में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की रेड के दौरान पश्चिम बंगाल की सीएम के अचानक पहुंचने पर सवाल उठाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- आपने वहां पहुंचकर ठीक नहीं किया। ऐसे असामान्य हालात में केंद्रीय एजेंसी को क्या करना चाहिए। अगर कल कोई और मुख्यमंत्री भी ऐसी छापेमारी में घुस जाए तो क्या ED के पास कोई समाधान नहीं होगा।
ED ने सुप्रीम कोर्ट में ममता के I-PAC के कार्यालय और प्रतीक जैन के घर और कार्यालय से लैपटॉप, फोन और कई दस्तावेज ले जाने को सत्ता का गंभीर दुरुपयोग बताया है। एजेंसी ने मुख्यमंत्री और उनके साथ आए अधिकारियों के खिलाफ पुलिस केस दर्ज करने की मांग भी की है।

तस्वीर 8 जनवरी, 2026 की है, जब बंगाल CM ममता ने कोलकाता में ED की छापेमारी के बीच मीडिया को संबोधित किया था।
अब पूरे मामले को समझिए
8 जनवरी को ED की टीम ने प्रतीक जैन के कोलकाता के गुलाउडन स्ट्रीट स्थित घर और दूसरी टीम सॉल्टलेक स्थित दफ्तर पर छापा मारा था। प्रतीक जैन ही ममता बनर्जी के लिए पॉलिटिकल स्ट्रैटजी तैयार करते हैं।
कार्रवाई सुबह 6 बजे से शुरू हुई थी, लेकिन करीब 11:30 बजे के बाद मामला बढ़ा। सबसे पहले कोलकाता पुलिस कमिश्नर, प्रतीक के आवास पर पहुंचे। कुछ समय बाद सीएम ममता बनर्जी खुद लाउडन स्ट्रीट स्थित उनके घर पहुंच गईं।
ममता वहां कुछ देर रुकीं। जब बाहर निकलीं, तो उनके हाथ में एक हरी फाइल दिखाई दी। इसके बाद वे I-PAC के ऑफिस भी गईं। उन्होंने कहा- गृहमंत्री मेरी पार्टी के दस्तावेज उठवा रहे हैं। ED ने कहा कि पश्चिम बंगाल में 6 और दिल्ली में 4 ठिकानों पर छापेमारी की गई।
कोर्ट रूम LIVE…
- राज्य सरकार: इस मामले में संवैधानिक ढांचे से जुड़े मूलभूत सवाल हैं, इसलिए दो जजों की बेंच इसे तय नहीं कर सकती।
- राज्य सरकार: ‘किसी केंद्रीय सरकारी विभाग को राज्य सरकार के खिलाफ याचिका दायर करने की अनुमति देना संघीय ढांचे के लिए खतरनाक होगा। उन्होंने कहा कि CBI, NCB, DRI और SFIO जैसी जांच एजेंसियों को भी स्वतंत्र रूप से मुकदमा दायर करने का वैधानिक अधिकार नहीं है। इसी तरह, राज्य स्तर की एजेंसियां CID, विजिलेंस आयोग और एंटी-करप्शन ब्यूरो के पास भी ऐसे अधिकार नहीं होते।
- जस्टिस मिश्रा: अगर कोई असामान्य स्थिति पैदा होती है, जैसे कोई मुख्यमंत्री केंद्रीय एजेंसी के काम में बाधा डालता है, तो क्या होगा। अगर अनुच्छेद 226 और 32 के तहत भी याचिका स्वीकार्य नहीं है, तो फिर फैसला कौन करेगा? कोई न कोई रास्ता होना चाहिए, ऐसा शून्य नहीं होना चाहिए।
- राज्य सरकार: संविधान में उपाय मौजूद हैं और केंद्र सरकार उचित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कर सकती है, बजाय इसके कि कोई विभाग खुद स्वतंत्र रूप से याचिका दायर करे। अलग-अलग विभागों को सीधे याचिका दायर करने की अनुमति देने से संघीय ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है। सरकारों के बीच अनियंत्रित मुकदमेबाजी बढ़ सकती है।
