DDU में 'गिरई' मछली पर रिसर्च:दो असिस्टेंट प्रोफेसरों ने मछली के अंदर पाए जाने वाले हेलमिन्थ परजीवियों पर की स्टडी


दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर यूनिवर्सिटी के जूलॉजी डिपार्टमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सुशील कुमार और पीएचडी छात्र व देवरिया के बाबा राघव दास पीजी कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर अनिल कुमार ने मिलकर मछलियों पर एक वैज्ञानिक रिसर्च किया है। इस रिसर्च टीम ने देवरिया और सुल्तानपुर जिले की नदियों और तालाबों में मिलने वाली मशहूर खाने वाली मछली ‘गिरई’ (चन्ना पंक्टेटस) का स्टडी किया। जिसमे गिरई मछली के अंदर पाए जाने वाले हेलमिन्थ परजीवियों (जैसे फीता कृमि, चपटा कृमि और गोल कृमि यानी अलग-अलग तरह के कीड़े) की जांच की गई। डॉ. सुशील कुमार को ग्लोबल साइंटिफिक इंडेक्स 2025 में दुनिया के टॉप 5% वैज्ञानिकों में शामिल किया गया है। उनके डायरेक्शन में हुए इस रिसर्च को इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च के ऑफिशियल जर्नल “इंडियन जर्नल ऑफ एनिमल साइंसेज” (वॉल्यूम 95, इश्यू 12) में जगह मिली है। पानी के इकोसिस्टम का हिस्सा हैं ये कीड़े शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि ये परजीवी (पैरासाइट्स) पानी के इकोसिस्टम का एक नॉर्मल हिस्सा हैं। नेचुरल वाटर सोर्सेज (नदियों-तालाबों) में रहने वाली मछलियों में इनका मिलना एक आम बात है। ये कीड़े अपनी लाइफ साइकिल (जीवन चक्र) के दौरान घोंघों, मछलियों, चिड़ियों और कई तरह के मैमल्स (स्तनधारी जीवों) के बीच फैलते रहते हैं। इन कीड़ों के अंडे, लार्वा और एडल्ट स्टेज मछलियों के शरीर में देखे जा सकते हैं। 400 मछलियों के सैंपल लिए गए
रिसर्च के लिए कुल 400 मछलियों के सैंपल लिए गए, जिसमें दोनों जिलों (देवरिया और सुल्तानपुर) से 200-200 सैंपल थे।देवरिया में घाघरा और छोटी गंडक नदी के किनारे 4 जगहों से और सुल्तानपुर में गोमती नदी के किनारे 3 जगहों से सैंपल कलेक्ट किए गए। हाई-टेक जांच किया गया
स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (SEM) जांच के लिए सैंपल्स को 2.5% ग्लूटाराल्डिहाइड में फिक्स किया गया। फिर बफर से धोकर, इथेनॉल की बढ़ती हुई सीरीज से डिहाइड्रेट किया गया (सुखाया गया)। इसके बाद क्रिटिकल पॉइंट ड्रायर में सुखाकर और हाई वैक्यूम में इमेजिंग से पहले स्पटर कोटिंग की गई। रिसर्च के मुख्य नतीजे
जांच में सामने आया कि मीठे पानी की इन मछलियों में कीड़ों का फैलाव, उनकी संख्या और उनका एवरेज लेवल देवरिया और सुल्तानपुर दोनों जगहों पर साल भर एक जैसा ही रहा। दोनों जिलों के बीच इसमें कोई बड़ा या खास अंतर नहीं मिला। दोनों जगहों पर इन कीड़ों की प्रजातियों (स्पेशीज) का ऑर्डर भी एक जैसा था। इस स्टडी से यह भी साबित हुआ कि मछली पालन के काम में नॉन-पैरामीट्रिक तुलना और फैलाव का समरी डेटा काफी काम का है। शोधकर्ताओं का कहना है कि फ्यूचर में मछली पालन से जुड़े हेल्थ प्रोग्राम्स में खतरों को मैनेज करने और वक्त रहते चेतावनी देने के लिए, इस कीड़े की लाइफ साइकिल और इसके बीच के होस्ट्स (जिन जीवों के जरिए यह फैलता है) पर लगातार नजर रखना और स्टडी करना बेहद जरूरी है। पूरी तरह पकाकर ही खाएं मछली- वैज्ञानिक
डॉ. सुशील कुमार ने मछली खाने वालों को एक जरूरी सलाह दी है। उन्होंने बताया कि मछलियों को खाने से पहले उनके अंदर के अंगों (इंटेस्टाइन आदि) को अच्छी तरह से निकाल कर साफ कर देना चाहिए। इसके बाद मछली को पूरी तरह से पकाकर ही खाना चाहिए। सही तरीके से साफ करने और ठीक से पकाने से इंफेक्शन का खतरा खत्म हो जाता है, जिससे मछली खाने के लिए बिल्कुल सुरक्षित हो जाती है। वीसी ने दी बधाई
कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने पूर्वांचल इलाके के लिए हुए इस इम्पोर्टेंट रिसर्च पर पूरी टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह स्टडी लोकल लेवल पर मछली के सोर्सेज, बायोडायवर्सिटी और पैरासाइट-होस्ट के रिश्तों को समझने में बहुत मददगार साबित होगी।

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *