महुआ डाबर महोत्सव शुरू, 1857 के शहीदों को नमन:ब्रिटिश सरकार से नरसंहार पर माफी मांगने की मांग


बस्ती में तीन दिवसीय ‘महुआ डाबर महोत्सव’ का सोमवार को भव्य शुभारंभ हुआ। स्वतंत्रता संग्राम की गौरवगाथा से जुड़ी क्रांति की धरती महुआ डाबर में आयोजित इस महोत्सव का उद्घाटन प्रख्यात लेखक प्रणब मुखर्जी ने किया। महोत्सव का विषय ‘शौर्य, शहादत और विरासत’ रखा गया है। उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए प्रणब मुखर्जी ने 10 जून 1857 की ऐतिहासिक घटना का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उस दिन महुआ डाबर के क्रांतिवीरों ने छह ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों को मार गिराकर अंग्रेजी शासन को सीधी चुनौती दी थी। इसके प्रतिशोध में अंग्रेजों ने लगभग पांच हजार आबादी वाले समृद्ध गांव को ‘गैर-चिरागी’ घोषित कर जला दिया था। इस दौरान बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिकों का नरसंहार भी किया गया। मुखर्जी ने इस घटना को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय बताया। महुआ डाबर संग्रहालय के निदेशक और क्रांतिकारी वंशज डॉ. शाह आलम राना ने कहा कि देश के सबसे बड़े नागरिक नरसंहारों में से एक होने के बावजूद इस घटना को इतिहास में वह स्थान नहीं मिल पाया, जिसकी यह हकदार है। महोत्सव में एक प्रस्ताव पारित कर ब्रिटिश सरकार से 3 जुलाई 1857 के महुआ डाबर नरसंहार के लिए औपचारिक माफी मांगने की मांग की गई। साथ ही, 1857 में जब्त की गई क्रांतिवीरों की संपत्तियों का ब्यौरा सार्वजनिक कर उनकी वापसी सुनिश्चित करने की मांग भी उठाई गई। वक्ताओं ने उत्तर प्रदेश पर्यटन नीति-2022 के तहत घोषित स्मारक और ‘स्वतंत्रता संग्राम सर्किट’ की योजनाओं को शीघ्र लागू करने पर जोर दिया। उन्होंने महुआ डाबर में ‘शहादत विरासत कॉरिडोर’ विकसित करने की आवश्यकता भी बताई। कार्यक्रम में लोकगायक सुनील पंडित की प्रस्तुति ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। भीषण गर्मी के बावजूद हेरिटेज वॉक में बड़ी संख्या में युवाओं, शोधार्थियों और स्थानीय लोगों ने भाग लेकर महुआ डाबर के गौरवशाली इतिहास को जाना। 10 जून को शौर्य दिवस के अवसर पर शहीदों को सशस्त्र पुलिस गारद द्वारा सलामी दी गई।

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