अहिल्याबाई ने कराया थाप्राचीन कल्कि मंदिर का जीर्णोद्धार:संभल में ट्रस्ट की देखरेख में होता है संचालन, नाग पंचमी पर मनाई जाती है भगवान कल्कि की जयंती


देशभर में लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की जयंती मनाई जा रही है। ऐसे में संभल स्थित भगवान विष्णु के दसवें अवतार भगवान कल्कि के प्राचीन मंदिर का इतिहास भी चर्चा में है। मान्यता है कि इस मंदिर का जीर्णोद्धार अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था। तभी से मंदिर का संचालन खासगी ट्रस्ट के माध्यम से किया जा रहा है। कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला कोट पूर्वी में स्थित यह प्राचीन श्रीकल्कि विष्णु मंदिर धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर अहिल्याबाई होल्कर ट्रस्ट की मुहर अंकित है। परिसर में माता अहिल्याबाई की तस्वीर के साथ मंदिर के पूर्व पुजारियों के चित्र भी स्थापित हैं। नाग पंचमी और षष्ठी पर मनती है भगवान कल्कि की जयंती मंदिर में प्रत्येक वर्ष सावन माह की नाग पंचमी और षष्ठी तिथि पर भगवान कल्कि की दो दिवसीय जयंती धूमधाम से मनाई जाती है। इस वर्ष यह आयोजन 16 और 17 अगस्त को प्रस्तावित है। इस अवसर पर दूर-दराज के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं और भगवान कल्कि के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं। पुजारी बोले- मंदिरों के पुनरुद्धार में अहिल्याबाई का बड़ा योगदान मंदिर के पुजारी पंडित महेंद्र प्रसाद शर्मा ने बताया कि अहिल्याबाई होल्कर का जन्मोत्सव पूरे देश में मनाया जाना चाहिए। उन्होंने अपना जीवन धर्म और जनकल्याण के कार्यों को समर्पित किया था। उन्होंने कहा कि काशी विश्वनाथ, सोमनाथ और संभल के कल्कि मंदिर समेत देश के अनेक प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार और संरक्षण में अहिल्याबाई होल्कर तथा उनके परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पूर्वज थे अहिल्याबाई के राज-ज्योतिषी पंडित महेंद्र प्रसाद शर्मा के अनुसार उनका परिवार पीढ़ियों से इस मंदिर से जुड़ा हुआ है। उन्होंने दावा किया कि उनके पूर्वज माता अहिल्याबाई होल्कर के राज-ज्योतिषी थे। उन्होंने बताया कि पूर्वजों ने ही अहिल्याबाई को संभल स्थित इस क्षतिग्रस्त मंदिर की जानकारी दी थी, जिसके बाद मंदिर के पुनरुद्धार का कार्य कराया गया। मंदिर की संरचना और मान्यताएं भी हैं खास मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु, माता पद्मावती और सफेद घोड़े से जुड़े विग्रह स्थापित हैं, जबकि एक स्थान रिक्त रखा गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान कल्कि के प्राकट्य के बाद माता वैष्णो देवी पद्मावती स्वरूप में वहां विराजमान होंगी। श्रद्धालु मंदिर में “जय कल्कि जय जगत्पते, पद्मावती जय रमापति” महामंत्र का जाप करते हैं। मंदिर की दक्षिण भारतीय शैली की वास्तुकला, परिसर में स्थित कलकेश्वर महादेव और शिखर पर बड़ी संख्या में दिखाई देने वाले तोते भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं। 2017 के बाद हुआ सौंदर्यीकरण मंदिर प्रबंधन के अनुसार वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद मंदिर के विकास और सौंदर्यीकरण के लिए 60 लाख रुपये से अधिक की धनराशि उपलब्ध कराई गई थी। वहीं मंदिर परिसर के निकट श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए धर्मशाला का निर्माण भी कराया जा रहा है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। मंदिर के गर्भगृह में नियमित भोग और पूजा की जिम्मेदारी मंदिर के पुजारी निभाते हैं।

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