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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यह नहीं कहा जा सकता कि पिता को अपने नाबालिग बच्चो की अभिरक्षा किसी भी व्यक्ति को सौंपने का अधिकार है और किसी पैंरेंट को पिता के अभिरक्षा स्थानांतरित करने को चुनौती देने का अधिकार नहीं है। एकलपीठ का फैसला पलटा एकलपीठ ने कहा था कि एक पिता, जो एक नाबालिग का नैसर्गिक संरक्षक है, को अपने नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा ‘किसी भी व्यक्ति’ को स्थानांतरित करने का पूरा अधिकार है,जिसको खंडपीठ ने अस्वीकार करते हुए कहा किसी भी हालत में ऐसा आदेश कायम नहीं रह सकता।
यह भी कि माता-पिता में से कोई एक पिता के इस अधिकार को चुनौती नहीं दे सकता कि वह अपनी मर्ज़ी और सहमति से नाबालिग की अभिरक्षा किसी दूसरे व्यक्ति को दे, यह भी पूरी तरह से टिकने लायक नहीं है। खंडपीठ ने एकलपीठ के आदेश 3अप्रैल 26को रद करते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पुनर्बहाल कर दिया और कानून के तहत तय करने के लिए प्रकरण एकलपीठ को वापस कर दिया है। चीफ जस्टिस ने सुना केस यह आदेश मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली तथा न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने युवराज,आयुष्मान व अन्य की विशेष अपील को स्वीकार करते हुए दिया है। अपील पर अधिवक्ता रामधन ने बहस की। खंडपीठ ने कहा कि यह कहना पिता को नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा किसी भी व्यक्ति को ट्रांसफर करने का अधिकार है, कानून और नैतिकता के सभी नियमों के खिलाफ है और इसलिए इसे खारिज किया जाना चाहिए। मालूम हो कि याचीगण के पिता ने उनकी मां को अभिरक्षा देने के बजाय दूसरों को सौंप दिया।जिसको अवैध निरूद्धि मानते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई। एकलपीठ ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि पिता को अपने नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा किसी को भी सौंपने का अधिकार है।जिस आदेश को विशेष अपील में चुनौती दी गई थी। खंडपीठ ने एकलपीठ के आदेश को रद कर दिया और निर्णय लेने के लिए याचिका वापस कर दी। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की अगली सुनवाई 4मई को होगी।
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पिता बच्चे की अभिरक्षा किसी को सौंप दे सही नहीं:हाईकोर्ट ने एकलपीठ का आदेश किया रद्द, कानून के अनुसार निर्णय लें