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सुल्तानपुर में बुधवार शाम को सुन्नी समुदाय ने पहली मोहर्रम का जुलूस निकाला। यह जुलूस डिहवा मोहल्ले के इमामबाड़े से शुरू होकर राहुल चौराहा, शाहगंज और चौक होते हुए कर्बला तक पहुंचा। इस अवसर पर ‘आशिकाने अहले-बैत इंतजामिया कमेटी’ के गुलाम मोईनुद्दीन ने कर्बला के ऐतिहासिक संदेश और जुलूस के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह जुलूस हजरत इमाम हुसैन की याद में निकाला जाता है। गुलाम मोईनुद्दीन ने कहा कि यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक गहरा मानवीय संदेश है। यह जुलूस सच्चाई, ईमानदारी और इंसाफ के लिए आवाज उठाने की सीख देता है। कर्बला का मैदान सिखाता है कि किसी भी परिस्थिति में जुल्म के खिलाफ डटकर खड़ा रहना चाहिए। उन्होंने आगे बताया कि हजरत इमाम हुसैन के इस सार्वभौमिक संदेश की सराहना महात्मा गांधी और नेल्सन मंडेला जैसी महान विभूतियों ने भी की थी। दुनिया में हक की लड़ाई लड़ने वाले लोग कर्बला की सीख से प्रेरणा पाते हैं। सांप्रदायिक सद्भाव की परंपरा का जिक्र करते हुए मोईनुद्दीन ने बताया कि इस जुलूस में केवल मुस्लिम समुदाय ही नहीं, बल्कि सभी धर्मों के लोग हिस्सा लेते हैं। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि इसमें कम से कम 5 से 6 हिंदू ‘ताजियादार’ भी शामिल होते हैं, जो सर्वधर्म समभाव और आपसी भाईचारे का उदाहरण प्रस्तुत करता है। कमेटी के अध्यक्ष ने जुलूस के पारंपरिक रूट की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पहली और दसवीं मोहर्रम का जुलूस डिहवा से शुरू होकर पर्यावरण पार्क के बगल स्थित सुन्नी समुदाय के कर्बला पर संपन्न होता है। अन्य दिनों में यह जुलूस डाकखाने से वापस होते हुए पुनः डीहवा पर ही समाप्त होता है। उन्होंने पूरी इंसानियत को संदेश देते हुए कहा कि हजरत इमाम हुसैन ने कर्बला के मैदान से यह पैगाम दिया था कि हक और सच्चाई के लिए अगर अपना पूरा कुनबा भी कुर्बान करना पड़े, तो पीछे नहीं हटना चाहिए।
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सुल्तानपुर में सुन्नी समुदाय ने निकाला पहला मोहर्रम जुलूस:गुलाम मोईनुद्दीन बोले- कर्बला का संदेश सच्चाई और इंसाफ के लिए आवाज उठाना