सरयूपार क्षेत्र की प्राचीन बसावटों पर व्याख्यान:लखनऊ में प्रो. दुर्गेश श्रीवास्तव ने पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम में दी जानकारी


उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय लखनऊ परिसर की ओर से गुरुवार कों ‘पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम-2026’ के आठवें व्याख्यान का आयोजन किया गया। व्याख्यान का विषय ‘अन्सिएंट सेटलमेंट पैटरनस एंड जियोमोरफोलॉजी ऑफ़ सरयूपारा रीजन ’ रहा। लखनऊ विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफेसर दुर्गेश कुमार श्रीवास्तव ने व्याख्यान दिया। प्रो. श्रीवास्तव ने बताया कि प्राचीन मानव बसावटों को समझने में नदी तंत्र, बाढ़ क्षेत्र, भू-आकृति और भूमि की ऊंचाई महत्वपूर्ण हैं। सरयूपार क्षेत्र में नदियों और सहायक धाराओं से बने भू-परिदृश्य ने अलग-अलग काल में मानव बसावटों को प्रभावित किया। श्रावस्ती समेत कोसल क्षेत्र ने प्राचीन भारत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक इतिहास में अहम भूमिका निभाई। कई पुरातात्त्विक स्थलों के साक्ष्य बताए उन्होंने श्रावस्ती, सपुर, चरदा, ओरझार और पिरवितानीसरिफ-त्रिलोकपुर समेत प्रमुख पुरातात्त्विक स्थलों पर चर्चा की। इन स्थलों से प्राक्-एनबीपीडब्ल्यू, एनबीपीडब्ल्यू, शुंग, कुषाण, गुप्त और मध्यकालीन संस्कृतियों के साक्ष्य मिले हैं। रेडियोकार्बन तिथियों से क्षेत्र की शुरुआती बसावट और सांस्कृतिक निरंतरता को समझने में भी मदद मिली है। 452 स्थलों से समझा बसावट का बदलाव प्रो. श्रीवास्तव ने बताया कि पुरातात्त्विक सर्वेक्षणों में 452 महत्वपूर्ण स्थलों की पहचान की गई है। अलग-अलग काल में इन बसावटों के स्थान और उनके बीच की दूरी में बदलाव दिखाई देता है। शुरुआती दौर में बसावटें दूर-दूर थीं, जबकि बाद के समय में इनके अधिक पास और सघन होने की प्रवृत्ति दिखाई दी। इससे जनसंख्या विस्तार और सामाजिक-सांस्कृतिक विकास को समझने में मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि श्रावस्ती प्राचीन कोसल का महत्वपूर्ण केंद्र था। बौद्ध परंपरा के साथ प्राचीन व्यापारिक मार्गों में भी इसका विशेष महत्व रहा। स्थलाकृतिक, पुरातात्त्विक और ऐतिहासिक साक्ष्यों को साथ रखकर गंगा मैदान में मानव बसावटों के विकास को वैज्ञानिक तरीके से समझा जा सकता है। 140 प्रतिभागियों ने लिया हिस्सा निदेशक रेनू द्विवेदी ने अतिथि वक्ता का पौधा और स्मृति-चिह्न देकर स्वागत किया। उन्होंने व्याख्यान को सरयूपार क्षेत्र की भू-आकृति, पुरातात्त्विक साक्ष्यों और ऐतिहासिक विकास के संबंधों को समझने में उपयोगी बताया। कार्यक्रम में करीब 100 प्रतिभागी ऑफलाइन और 40 प्रतिभागी ऑनलाइन माध्यम से शामिल हुए।

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