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म्यांमार के रहने वाले आरोपी पर भारत में कथित तौर पर फर्जी पहचान पत्र और पासपोर्ट बनवाकर विदेश जाने के आरोप हैं। इस मामले में रिजवान उर्फ रफीक उर्फ रिदवान को अदालत से राहत नहीं मिली। अपर सत्र न्यायाधीश/पॉक्सो एक्ट कोर्ट संख्या-2 के न्यायाधीश हरेन्द्र कुमार ओझा ने सोमवार को उसकी जमानत अर्जी खारिज कर दी। अदालत ने आरोपों की गंभीरता और देश की सुरक्षा व शांति पर उनके संभावित प्रभाव को देखते हुए जमानत देने से इनकार किया। मामले की जानकारी एडीजीसी संजय शर्मा और लव बंसल ने दी।
मोबाइल में मिला भारतीय पासपोर्ट
अभियोजन के मुताबिक, 21 अगस्त 2026 को रोरावर पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर मथुरा बाईपास की तरफ नादा चौराहे के पास आरोपी को रोका था। तलाशी के दौरान उसके पास से दो मोबाइल फोन, आधार कार्ड, बैंक ऑफ बड़ौदा की पासबुक और यूएनएचसीआर कार्ड की छायाप्रति मिली। यूएनएचसीआर कार्ड पर म्यांमार की राष्ट्रीयता दर्ज थी, जबकि मोबाइल की गैलरी में भारतीय पासपोर्ट मिला।
पूछताछ में आरोपी ने अपना वास्तविक नाम रिजवान और म्यांमार के रखाइन प्रांत का निवासी होना बताया। अभियोजन कथानक के अनुसार, वह वर्ष 2013 में बांग्लादेश के रास्ते अलीगढ़ आया था। यहां मीट फैक्ट्री में काम करने के दौरान शाहिद नाम के युवक की मदद से उसने कथित तौर पर आधार कार्ड, पैन कार्ड और भारतीय पासपोर्ट बनवाया। इसी पासपोर्ट के आधार पर दुबई और सऊदी अरब में नौकरी करने का भी आरोप है।
बिना पासपोर्ट-वीजा भारत में रहने का आरोप
अभियोजन के अनुसार, विदेश से लौटने के बाद आरोपी ने डर की वजह से अपना पासपोर्ट जला दिया और बांग्लादेश चला गया। करीब एक महीने पहले वह फिर भारत आया था। पुलिस ने उसके खिलाफ रोरावर थाने में मुकदमा दर्ज किया। अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने और केस डायरी में उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद जमानत अर्जी निरस्त कर दी।
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रोहिंग्या आरोपी को जमानत नहीं, कोर्ट ने खारिज की अर्जी:अलीगढ़ में लगा था फर्जी भारतीय पासपोर्ट से दुबई-सऊदी अरब में नौकरी करने का आरोप