बलिया में निकलेगी चांदी की ताजिया, VIDEO:साल में सिर्फ एक दिन होता है दीदार, मुहर्रम पर उमड़ते हैं अकीदतमंद


बलिया के शेखपुर गांव में स्थित ऐतिहासिक चांदी की ताजिया धार्मिक आस्था, परंपरा और गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि साल में केवल एक दिन, मुहर्रम के अवसर पर ही इसके दीदार करने का मौका मिलता है। शेष पूरे वर्ष ताजिया को पूरी अक़ीदत और सम्मान के साथ सुरक्षित ढंककर रखा जाता है। गांव में हसन रिजवी के दरवाजे के समीप स्थित मजार परिसर में संरक्षित इस चांदी की ताजिया का नुमाइश मुहर्रम के निर्धारित दिन विशेष मज़हबी रस्मों के साथ किया जाता है। हसन रिजवी ने बताया कि ताजिया के दर्शन के लिए बलिया के अलावा उत्तर प्रदेश और बिहार के अलग-अलग जिलों से सैकड़ों की संख्या में अकीदतमंद पहुंचते हैं। सुबह से ही अकीदतमंदों की लंबी कतारें लग जाती हैं और पूरा क्षेत्र “या हुसैन” की सदाओं से गूंज उठता है। पूरी होती हैं सच्चे मन से मांगी गई मन्नतें अकीदतमंद मजार पर चादर चढ़ाकर फातिहा पढ़ते हैं तथा अपने परिवार की सुख-समृद्धि, अमन-चैन और देश की खुशहाली की दुआ करते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नतें पूरी होती हैं। यही अकीदत हर वर्ष दूर-दराज से बड़ी संख्या में अकीदतमंदों को इस पवित्र स्थल तक खींच लाती है। ताजिया को सम्मानपूर्वक ढंक दिया जाता है दुबारा दीदार होने के बाद धार्मिक परंपरा के अनुसार चांदी की ताजिया को दुबारा सम्मानपूर्वक ढंक दिया जाता है। इसके बाद अगले मुहर्रम तक किसी को भी दीदार की अनुमति नहीं होती। इसी अनूठी परंपरा ने शेखपुर गांव को पूर्वांचल में एक अलग धार्मिक पहचान दिलाई है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी उसी अकीदत, अनुशासन और सम्मान के साथ निभाई जा रही है। मुहर्रम के अवसर पर यहां सभी समुदायों के लोग पहुंचकर आपसी भाईचारे, प्रेम और सौहार्द का संदेश देते हैं। यह स्थल धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक एकता और सांप्रदायिक सद्भाव का भी प्रतीक माना जाता है।

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