प्रशांत किशोर जीतें या हारें, 3 बड़े बदलाव तय!:क्या सम्राट चौधरी की कुर्सी हिलेगी, तेजस्वी-निशांत की राजनीति बिगड़ेगी?, जानिए 3 पॉइंट में


जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर अपना पहला चुनाव भाजपा के गढ़ बांकीपुर में जीतेंगे या हारेंगे, इसका फैसला आज दोपहर तक हो जाएगा। प्रशांत जीते, बुरी तरह हारे या कड़ी टक्कर देकर हारे तो आगे क्या होगा…समझेंगे; बूझे की नाही में…। प्रशांत जीते तो पूरी तरह बदल जाएगी बिहार की राजनीति 1. ‘जातिवादी मॉडल’ का अंत और ‘गवर्नेंस’ पर तेज होगी चर्चा बिहार की राजनीति दशकों से जाति आधारित समीकरणों (यादव, कुर्मी, राजपूत, भूमिहार, मुस्लिम, EBC, दलित आदि) पर टिकी है। प्रशांत किशोर लगातार जाति से ऊपर और ‘विकास-गवर्नेंस’ की बात करते रहे हैं। 2. भाजपा कमजोर होगी, JDU-RJD का संभलना मुश्किल बांकीपुर भाजपा का पारंपरिक किला रहा है। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन का परिवार 1995 से यहां से जीतता रहा है। प्रशांत किशोर चुनाव प्रचार के दौरान खुद कह चुके हैं- ‘यहां हमारी जीत तब ही होगी, जब दशकों से भाजपा को वोट दे रहा एक बड़ा तबका हमारी तरफ शिफ्ट होगा।’ इसका मतलब कि अगर यहां भाजपा हारी तो साफ है कि उसका शहरी, मिडिल क्लास और अपर कास्ट का मजबूत आधार हिल गया है। विकल्प नहीं होने और लालू राज के लौटने के डर से भाजपा को वोट दे रहे लोगों को राज्यभर में विकल्प मिल जाएगा। इसका सीधा असर भाजपा के कोर वोटरों पर पड़ेगा। भाजपा का अभी भी सबसे मजबूत आधार वोट बैंक जनरल कास्ट है, जो कांग्रेस से खिसक कर उसके पास पहुंचा है। अगर यह वोट बैंक भाजपा से खिसका तो बिहार में उसकी स्थिति कांग्रेस वाली हो सकती है। प्रशांत किशोर खुद कह चुके हैं- ‘यह उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं है, सम्राट चौधरी के खिलाफ भी जनमत टेस्ट है। क्योंकि नीतीश कुमार के नाम पर वोट लेकर भाजपा ने अपना आदमी सेट किया है। यहां अगर भाजपा हारी तो इसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई देगी।’ 2 अगस्त को प्रशांत किशोर ने भी दोहराया- ‘चुनाव सम्राट चौधरी के नाम पर जनमत संग्रह है। अगर भाजपा हारती है तो इसकी नैतिक जिम्मेदारी सम्राट चौधरी को लेनी होगी। उनको इस्तीफा देना चाहिए। अगर नहीं देंगे इस्तीफा दो भाजपा अपने ले लेगी।’ मने अगर प्रशांत किशोर चुनाव जीते तो वह सीधे तौर पर राज्यभर में लोगों के बीच जाकर यह बात दोहराएंगे और कहेंगे कि सम्राट चौधरी ज्यादा दिनों तक मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे। इससे भाजपा के अंदरखाने शक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा। कुल मिलाकर तीनों पार्टियों भाजपा, JDU और RJD को अपनी रणनीति बदलनी होगी। नए सिरे से समीकरण बनाने होंगे। 3. गठबंधन का स्वरूप बदलेगा बीते 35 सालों में बिहार में कोई पार्टी अपने दम पर सरकार नहीं बना पाई है। उसे सत्ता की कुर्सी पाने के लिए दूसरे दलों से गठबंधन करना ही पड़ा है। फिलहाल राज्य में दो गठबंधन है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और महागठबंधन। NDA में 5 पार्टियां हैं-BJP, JDU, LJP(R), HAM, RLM। महागठबंधन में 7 पार्टियां हैं-RJD, कांग्रेस, माले, CPI, CPI(M), IIP, VIP। 4. वोट-कटवा से आगे बढ़कर ‘गेम-चेंजर’ की छवि 2025 बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज को वोट-कटवा कहा गया। पार्टी 238 सीटों पर लड़ी, एक भी नहीं जीत पाई। 237 सीटों पर तो जमानत जब्त हो गई। हालांकि, एक सीट की जीत से गेम-चेंजर बनना आसान है, लेकिन उसे बनाए रखना मुश्किल। अगर अगले चुनावों में प्रदर्शन नहीं दिखाया तो यह छवि फिर से फीकी पड़ सकती है। PK कड़ी टक्कर देकर हारे तो 2 चीजें होनी तय 1. भाजपा का मनोबल टूटेगा अगर प्रशांत किशोर कड़ी टक्कर देकर हारते हैं (यानी भाजपा की जीत मुश्किल से होती है या वोट शेयर में भारी गिरावट आती है), तो पार्टी के अंदर और बाहर दोनों जगह मनोबल प्रभावित होगा। हालांकि, मनोबल पूरी तरह नहीं टूटेगा क्योंकि जीत तो हासिल हो जाएगी। लेकिन आसान जीत की धारणा खत्म हो जाएगी। जैसे- बांकीपुर को लेकर कहा था- कुत्ता, बिल्ली को भी टिकट देंगे तो जनता जीता देगी। इस तरह का आत्मविश्वास टूट जाएगा। 2. RJD-कांग्रेस को फौरी राहत, लेकिन टेंशन बढ़ेगी अगर प्रशांत किशोर हार जाते हैं तो महागठबंधन को तत्काल राहत मिलेगी कि तीसरी ताकत अभी पूरी तरह नहीं उभरी है। लेकिन कड़ी टक्कर का मतलब यह भी होगा कि उनका अपना वोट बैंक प्रभावित हो रहा है। हालांकि, यह राहत अस्थायी होगी। PK की मौजूदगी उन्हें लगातार सतर्क रखेगी और अपने एजेंडे रोजगार, पलायन, युवाओं के मुद्दे को और तेज करने के लिए मजबूर करेगी। प्रशांत किशोर अगर बुरी तरह हारे तब… 1. पुराने ढर्रे की राजनीति जारी रहेगी बिहार की राजनीति लंबे समय से जाति-आधारित समीकरण, परिवारवाद, गठबंधन की जुगत और स्थापित दलों BJP-JDU बनाम RJD-कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है। PK लगातार नया मॉडल (गवर्नेंस, मेरिट, जाति से ऊपर) की बात करते रहे हैं। 2. नए विकल्प तलाशने वालों को झटका 2025 के चुनाव और उसके बाद प्रशांत किशोर की यात्राओं ने कई युवा, शहरी, मिडिल क्लास और नाराज वोटरों में तीसरा विकल्प की उम्मीद जगाई थी। बांकीपुर में खुद मैदान में उतरकर उन्होंने इस उम्मीद को और मजबूत किया था। 3. जन सुराज कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटेगा जन सुराज अभी नई पार्टी है। 2025 में शून्य सीट के बाद कार्यकर्ताओं का मनोबल पहले से ही चुनौती में था। प्रशांत किशोर की खुद की उम्मीदवारी ने उन्हें नई ऊर्जा दी थी। हालांकि, अगर प्रशांत किशोर सक्रिय रहें और मुद्दों पर दबाव बनाए रखें तो कुछ समर्पित कार्यकर्ता टिके रह सकते हैं। लेकिन व्यापक मनोबल टूटना लगभग तय है। एक्सपर्ट पैनलः पॉलिटिकल एनालिस्ट संजय सिंह, प्रियदर्शी रंजन, केके लाल, सत्यभूषण सिंह।

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