केवल माता-पिता की सैलरी OBC क्रीमी लेयर का आधार नहीं:सुप्रीम कोर्ट बोला- उनके पद और स्थिति भी देखना होगी, UPSC सिविल सर्विस पास कैंडिडेट्स का मामला




सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को OBC क्रीमी लेयर तय करने के मामले में कहा कि केवल माता-पिता या अभिभावकों की सैलरी के आधार पर किसी की कैटेगरी तय नहीं की जा सकती। माता-पिता या अभिभावकों के पद और स्थिति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने फैसले में केंद्र सरकार की उन अपीलों को खारिज कर दिया, जो हाईकोर्ट के फैसलों के खिलाफ थीं। कोर्ट ने उन UPSC कैंडिडेट्स को बड़ी राहत दी है, जिन्हें सिविल सेवा परीक्षा पास करने के बावजूद नौकरी नहीं दी गई थी। सरकार ने उनके माता-पिता की सैलरी को आधार मानकर उन्हें क्रीमी लेयर की श्रेणी में डाल दिया था। कोर्ट ने साफ किया कि अधिकारियों ने कैंडिडेट्स को आरक्षण से बाहर करने के लिए गलत पैमाना अपनाया।

सरकार ने सैलरी को आय में जोड़ दिया यह पूरा विवाद उन कैंडिडेट्स से जुड़ा है जिनके माता-पिता पब्लिक सेक्टर्स (पीएसयू), बैंक या इसी तरह के संस्थानों में काम करते थे। सरकार ने 2004 के एक स्पष्टीकरण पत्र का सहारा लेकर कैंडिडेट्स के माता-पिता की सैलरी को आय में जोड़ दिया था। इस वजह से कैंडिडेट्स आरक्षण के लाभ से वंचित हो गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के सरकारी आदेश का हवाला दिया। यह आदेश इंदिरा साहनी मामले के बाद बना था। इसमें स्पष्ट है कि क्रीमी लेयर तय करने के लिए माता-पिता का पद (जैसे ग्रुप ए या ग्रुप बी अधिकारी) मुख्य आधार है। इस नियम के तहत सैलरी और खेती से होने वाली कमाई को आय/संपत्ति में शामिल नहीं किया जाता। कोर्ट ने कहा कि 2004 का एक पत्र मुख्य नीति को नहीं बदल सकता। कोर्ट यह भी पाया कि सरकारी कर्मचारियों और पीएसयू कर्मचारियों के बीच भेदभाव करना गलत है। अगर सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को पद के आधार पर छूट मिलती है, तो पीएसयू कर्मचारियों के बच्चों को केवल सैलरी के आधार पर आरक्षण से बाहर करना समानता के अधिकार का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि वह 6 महीने के भीतर इन कैंडिडेट्स के दावों पर फिर से विचार करे। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर जरूरी हो तो इन कैंडिडेट्स को नौकरी देने के लिए अलग से पद बनाए जाएं। ———————— ये खबर भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इच्छामृत्यु की इजाजत दी:13 साल से कोमा में है बेटा, माता-पिता ने लगाई थी गुहार नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (11 मार्च) को इच्छामृत्यु मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने 13 साल से कोमा में रह रहे 31 साल के युवक हरीश राणा को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की मंजूरी दे दी। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर हैं। पढ़ें पूरी खबर…



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