कानपुर के डॉक्टर की रिसर्च JAMA Cardiology में प्रकाशित:डायबिटीज और मल्टीपल ब्लॉकेज वाले 1,800 मरीजों पर 5 साल अध्ययन


हृदय रोगों के इलाज से जुड़ी भारतीय रिसर्च को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिली है। कार्डियोलॉजी संस्थान के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. एसके सिन्हा की प्रमुख भागीदारी वाला वैज्ञानिक अध्ययन TUXEDO-2 प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल JAMA Cardiology में प्रकाशित हुआ है। रिसर्च में डायबिटीज से पीड़ित और दिल की एक से ज्यादा धमनियों में गंभीर ब्लॉकेज वाले मरीजों को शामिल किया गया। एंजियोप्लास्टी के बाद इन मरीजों को खून के थक्के बनने से रोकने के लिए दी जाने वाली दो प्रमुख दवाओं टिकाग्रेलर और प्रासुग्रेल की तुलना की गई। करीब 1,800 मरीजों पर लगभग 5 साल तक निगरानी के बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि मृत्यु, दोबारा हार्ट अटैक, स्ट्रोक और गंभीर ब्लीडिंग जैसे मामलों में दोनों दवाओं के बीच कोई बड़ा अंतर नहीं रहा। हालांकि, जटिल मरीजों में प्रासुग्रेल एक महत्वपूर्ण उपचार विकल्प के तौर पर सामने आई है। 5 साल तक मरीजों की निगरानी रिसर्च में ऐसे करीब 1,800 मरीज शामिल किए गए, जिन्हें डायबिटीज के साथ दिल की कई धमनियों में ब्लॉकेज थी और एंजियोप्लास्टी के दौरान स्टेंट डाला गया था। इन मरीजों की करीब पांच साल तक निगरानी की गई। स्टडी का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना था कि स्टेंट के बाद टिकाग्रेलर और प्रासुग्रेल में से कौन सी दवा थक्के, हार्ट अटैक, स्ट्रोक और मौत के खतरे को रोकने में ज्यादा प्रभावी और सुरक्षित है। दोनों दवाओं के नतीजों में बड़ा अंतर नहीं लंबे फॉलोअप के बाद शोधकर्ताओं को दोनों समूहों में मृत्यु, दोबारा हार्ट अटैक, स्ट्रोक और गंभीर रक्तस्राव की घटनाओं में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं मिला। वैज्ञानिक मानकों के मुताबिक टिकाग्रेलर, प्रासुग्रेल से बेहतर साबित नहीं हो सकी। ऐसे में डायबिटीज और कई ब्लॉकेज वाले मरीजों के लिए प्रासुग्रेल को एक अहम विकल्प माना गया है। डॉक्टरों के मुताबिक दवा का चुनाव मरीज की स्थिति के आधार पर करना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। उम्र और ब्लीडिंग के खतरे के आधार पर दवा तय होगी डॉ. एसके सिन्हा ने बताया कि एंजियोप्लास्टी के बाद हर मरीज को एक ही दवा देना सही तरीका नहीं है। मरीज की उम्र, डायबिटीज, ब्लॉकेज की स्थिति और ब्लीडिंग के खतरे को देखते हुए कार्डियोलॉजिस्ट तय करेंगे कि किसे प्रासुग्रेल और किसे टिकाग्रेलर देना उचित है। उन्होंने कहा कि स्टडी का उद्देश्य इलाज को मरीज के हिसाब से बेहतर बनाना है। इसका मतलब यह नहीं है कि मरीज खुद अपनी दवा बदलना शुरू कर दें। डॉक्टर की सलाह के बिना दवा बंद न करें डॉ. सिन्हा ने मरीजों को सलाह दी कि एंजियोप्लास्टी के बाद चल रही दवाओं को अपनी मर्जी से बंद न करें और न ही उनकी खुराक में बदलाव करें। किसी भी तरह का परिवर्तन केवल संबंधित कार्डियोलॉजिस्ट की सलाह से ही किया जाना चाहिए। TUXEDO-2 के प्रकाशन को भारतीय हृदय रोग विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

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