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बरेली के भोजीपुरा स्थित श्रीराम मूर्ति स्मारक इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज) में रुहेलखंड और कुमायूं रीजन का पहला बोन मैरो ट्रांसप्लांट (अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण) सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इसमें एक वर्ष से ज्यादा समय से मल्टीपल मायलोमा (एक प्रकार ब्लड कैंसर) की वजह से पीठ दर्द से परेशान बनबसा (उत्तराखंड) निवासी 47 वर्षीय कमला (बदला हुआ नाम) को तकलीफ से निजात मिली। इस सफल बोन मैरो ट्रांसप्लांट के साथ ही एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज लखनऊ और दिल्ली के बीच पहला संस्थान बन गया है जहां मरीजों के लिए यह सुविधा उपलब्ध है। यह जानकारी एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज में शनिवार को आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में दी गई। एसआरएमएसर ट्रस्ट के संस्थापक एवं चेयरमैन देव मूर्ति ने 2002 में मेडिकल कॉलेज की स्थापना और उपलब्धियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बढ़ती हुई बीमारियों के इलाज के लिए अत्याधुनिक मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराना जरूरी है। इसी को ध्यान में रखते हुए बोन मैरो ट्रांसप्लांट सुविधा आरंभ की गई है। जिसके तहत पहला बोन मैरो ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। अन्य चार लोग भी बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं। ज्यादा से ज्यादा लोगों को बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए जल्द ही एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज में बोन मैरो ट्रांसप्लांट विंग स्थापित की जाएगी। डॉ.पियूष अग्रवाल ने कैंसर को महामारी बताया एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज स्थित आरआर कैंसर इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर डॉ.पियूष अग्रवाल ने कैंसर को महामारी बताया। उन्होंने कहा कि न्यूयॉर्क में हो या मुंबई में कैंसर का इलाज रेडिएशन, सर्जरी और कीमोथेरेपी से ही किया जाता है। यही सुविधाएं भोजीपुरा स्थित हमारे एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज में उपलब्ध हैं। यहां पर अत्याधुनिक उपकरणों के साथ कैंसर सर्जरी के सभी विभाग और विशेषज्ञ मौजूद हैं। उत्तराखंड के मरीज का हुआ सफलतापूर्वक बोन मैरो ट्रांसप्लांट बनबसा (उत्तराखंड) निवासी 47 वर्षीय कमला (बदला हुआ नाम) का सफलतापूर्वक बोन मैरो ट्रांसप्लांट कर एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज रुहेलखंड और कुमायूं रीजन का पहला संस्थान बन गया है, जहां पर यह सुविधा उपलब्ध है। कमला एक वर्ष से ज्यादा समय से पीठ दर्द से परेशान थीं। जांच में मल्टीपल मायलोमा की जानकारी मिली। यहां पर टारगेटेड थेरेपी और कीमोथेरेपी के जरिये पहले उन्हें कैंसर मुक्त किया गया। मल्टीपल मायलोमा के दोबारा होने के खतरे को कम करने के लिए उनके परिवार को बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सलाह दी गई। उनके तैयार होने पर 19 मई को ऑटोलोगस ट्रांसप्लांट यानी मरीज के शरीर से ही स्वस्थ बोन मैरो लेकर उनका ट्रांसप्लांट किया गया। आज कमला पूरी तरह से स्वस्थ हैं और जल्द ही उन्हें घर जाने की अनुमति दी जाएगी। डा.पियूष ने एसआरएमएस मेडिकल कालेज में थैलेसेमिया के लिए भी बोन मैरो आपरेशन सुविधा उपलब्ध शुरू होने की जानकारी दी। प्रेस कांफ्रेंस का संचालन एसआरएमएस मेडिकल कालेज के डाय़रेक्टर आदित्य मूर्ति ने किया। इस दौरान एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) डॉ.एमएस बुटोला, एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ.आरपी सिंह, कैंसर विभाग स्टाफ और बोन मैरो ट्रांसप्लांट टीम के मेंबर मौजूद रहे। बोन मैरो ट्रांसप्लांट को स्टेम सेल्स ट्रांसप्लांट भी कहते हैः डा.दिशा क्लीनिकल हेमेटोलॉजिस्ट डॉ.दिशा सत्या ने बोन मैरो ट्रांसप्लांट की जानकारी दी और बताया कि बोन मैरो (अस्थि मज्जा) हड्डियों के अंदर का वह स्पंजी हिस्सा होता है, जहाँ ‘स्टेम सेल्स’ बनते हैं। ये स्टेम सेल्स ही लाल रक्त कोशिकाएं (आरबीसी) और सफेद रक्त कोशिकाएं (डब्ल्यूबीसी) बनाते हैं। बोन मैरो ट्रांसप्लांट (प्रत्यारोपण) में मरीज के खुद के स्वस्थ स्टेम सेल्स निकालकर या डोनर से स्वस्थ स्टेम सेल्स निकालकर मरीज के रक्त प्रवाह (ब्लडस्ट्रीम) में ट्रांसफ्यूज किए जाते हैं। यह एक जीवन रक्षक चिकित्सा प्रक्रिया है, जिसे ‘स्टेम सेल ट्रांसप्लांट’ भी कहा जाता है। इसमें खराब हो चुकी बोन मैरो (अस्थि मज्जा) को नष्ट कर स्वस्थ स्टेम सेल्स (रक्त बनाने वाली कोशिकाएं) मरीज के शरीर में डाले जाते हैं। इसका उपयोग ब्लड कैंसर, थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है। बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन में मरीज का बोन मैरो और डोनर के बोन मैरो से मेल खाना जरूरी है। बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन दो प्रकार का ऑटोलोगस ट्रांसप्लांट और एलोजेनिक ट्रांसप्लांट होता है। ऑटोलोगस ट्रांसप्लांट में मरीज के शरीर से ही स्वस्थ बोन मैरो लेकर उनका ट्रांसप्लांट किया जाता है। इस तरह ब्लड कैंसर को ठीक करने के लिए ट्रांसप्लांट का उपयोग किया जाता है। एलोजेनिक ट्रांसप्लांट में किसी अन्य व्यक्ति के शरीर से बोन मैरो लेकर मरीज में ट्रांसप्लांट किया जाता है।
मल्टीपल मायलोमा का बोन मैरो ट्रांसप्लांट से नियंत्रण बेहतरः डा.अनादि मेडिकल ओंकोलॉजिस्ट डा.श्रीनिवास अनादि नायडू ने बताया कि मल्टीपल मायलोमा ब्लड कैंसर का एक प्रकार है, जो बोन मैरो (अस्थि मज्जा) में मौजूद प्लाज्मा कोशिकाओं को प्रभावित करता है। ये कोशिकाएं सामान्य एंटीबॉडी बनाने के बजाय असामान्य प्रोटीन बनाती हैं। जिससे हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है। रीढ़ और छाती की हड्डियों में तेज दर्द, अत्यधिक थकान और कमजोरी, खून की कमी, रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने से बार बार बीमार होना मल्टीपल मायलोमा के सामान्य लक्षण हैं। आधुनिक चिकित्सा में इसे नियंत्रित किया जा सकता है। कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने वाली दवाएं यानी कीमोथेरेपी और टारगेटेड थेरेपी, हड्डियों के दर्द में राहत दिलाने और ट्यूमर को सिकोड़ने के लिए रेडिएशन थेरेपी और स्टेम सेल ट्रांसप्लांट से मल्टीपल मायलोमा को नियंत्रित किया जाता है।
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एसआरएमएस में जल्द स्थापित होगी बोन मैरो ट्रांसप्लांट विंग-देव मूर्ति:रुहेलखंड और कुमायूं रीजन का पहला बोन मैरो ट्रांसप्लांट एसआरएमएस में सफलतापूर्वक संपन्न