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रामनगरी में रविवार को उदासीन संप्रदाय के संस्थापक एवं उदासीनाचार्य भगवान श्रीचंद्र जी महाराज का 532वां प्रकाशोत्सव श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। उदासीन संगत ऋषि आश्रम में भगवान श्रीचंद्र जी की प्रतिमा का विधिविधान से अभिषेक कर नवीन वस्त्र धारण कराए गए। आरती-पूजन के बाद विविध व्यंजनों का भोग अर्पित किया गया। संत-महंतों की उपस्थिति से आश्रम परिसर भक्ति और अध्यात्म की आभा से आलोकित रहा।महंत डॉ. भरत दास जी महाराज ने कहा कि भगवान श्रीचंद्र जी का जीवन त्याग, तपस्या, योग, वैराग्य और आत्मसाधना का अनुपम संगम था। भाद्रपद शुक्ल नवमी, विक्रम संवत 1551 में गुरु नानक देव जी और माता सुलक्षणा देवी के घर प्रकट हुए भगवान श्रीचंद्र जी ने सांसारिक मोह से विरक्त होकर अध्यात्म और लोकमंगल को जीवन का ध्येय बनाया। देश के विभिन्न क्षेत्रों में भ्रमण कर उन्होंने आध्यात्मिक चेतना का प्रसार किया और उदासीन परंपरा को व्यापक स्वरूप प्रदान किया।
उन्होंने कहा कि उदासीन परंपरा केवल वैराग्य नहीं, बल्कि ज्ञान, संयम, सेवा और लोककल्याण की साधना है। भगवान श्रीचंद्र जी की शिक्षाएं आज भी समाज को सत्य, करुणा, आत्मसंयम और सेवा का मार्ग दिखाती हैं। अयोध्या का संगत ऋषि उदासीन आश्रम इसी आध्यात्मिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए सनातन परंपरा, संस्कार निर्माण, गुरुकुल व्यवस्था और समाजसेवा के कार्यों में जुटा है। प्रकाशोत्सव में जानकी घाट बड़ा स्थान के महंत जन्मेजय शरण, बड़ा भक्तमाल के महंत अवधेश कुमार दास, दिगंबर अखाड़ा के महंत सहित बड़ी संख्या में संत-महंत उपस्थित रहे। सभी ने भगवान श्रीचंद्र जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को नमन करते हुए श्रद्धासुमन अर्पित किए। आश्रम के प्रबंधक स्वामी माधवानंद महाराज ने महंत डॉ. भरत दास के निर्देशन में संतों-महंतों का स्वागत-सत्कार किया। अभिषेक दास ने संतों का स्वागत एवं सम्मान किया। धार्मिक अनुष्ठान के बाद श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया।
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अयोध्या में भगवान श्रीचंद्र महाराज का 532 वां प्रकाशोत्सव मना:महंत डॉ भरत दास बोले-उनका जीवन जीवन त्याग, तपस्या, योग, वैराग्य का अनुपम संगम