Sukhbir Singh Badal Meets PM Modi in Parliament

शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल ने दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की

शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल ने दिल्ली में पीएम नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। सुखबीर बादल शुक्रवार सुबह ही दिल्ली पहुंचे थे और पार्लियामेंट हाउस में पीएम मोदी से मिले। दोनों नेताओं की इस मुलाकात के बाद पंजाब की राजनीति गर्मा गई है।

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पंजाब विधानसभा चुनाव में अब करीब 4 महीने का समय बचा है। ऐसे में इस मुलाकात को चुनाव से पहले अहम माना जा रहा है। इसके साथ ही अकाली दल और BJP के बीच गठबंधन की चर्चा भी तेज हो गई है, माना जा रहा है कि अब गठबंधन फाइनल हो सकता है।

इधर, दोनों नेताओं की मुलाकात के बीच दिल्ली के पूर्व CM अरविंद केजरीवाल ने तंज कसते हुए लिखा-

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ना ना करते प्यार तुम्ही से कर बैठे……तो क्या चन्दा चोर पार्टी और बेअदबी पार्टी का गठबंधन हो रहा है?

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केजरीवाल के तंज पर जवाब देते हुए सुखबीर बादल ने केजरीवाल को पंजाब का सुपर CM कहते हुए सोशल मीडिया (X) पर लिखा- क्या आपको अपनी ये गारंटी याद है? 2022 से पहले AAP ने दावा किया था कि आप पंजाब में फल-फूल रहे ₹20,000 करोड़ के अवैध खनन को तुरंत बंद करवा देंगे और आज NGT के आदेश ने साबित कर दिया है कि आपकी सारी गारंटी गटर में फेंकने लायक हैं। क्योंकि ये सब बकवास हैं और कुछ नहीं!

वहीं कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा ने कहा- मुझे पहले से लगता था कि यह इकट्‌ठे होंगे। बीजेपी ने जोर लगाकर देख लिया। अकाली दल के खिलाफ बयान देकर देख लिया। अब दो बडे जीरों इकट्ठे हो गए हैं। कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा। मुझे पता था कि टूटी बाजू इकट्ठे होनी है। यह रहनी टूटी हुई है। सीधी बाजू का असर होता है।

गठबंधन का पिछले चुनावों में कैसा प्रदर्शन रहा

भाजपा और शिरोमणि अकाली दल का गठबंधन करीब 3 दशक तक पंजाब की राजनीति की सबसे सफल चुनावी गठजोड़ों में रहा। दोनों दलों ने 1997, 2007 और 2012 में मिलकर सरकार बनाई।

भाजपा-अकाली गठबंधन की कामयाबी का राज क्या था

भाजपा-अकाली गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत दोनों दलों का अलग-अलग वोट बैंक था। अकाली दल की पकड़ ग्रामीण, किसान और पंथक इलाकों में थी, जबकि भाजपा शहरों और शहरी हिंदू मतदाताओं के बीच मजबूत थी। दोनों दलों के साथ आने से गांव और शहर का चुनावी समीकरण बन जाता था।

दूसरी बड़ी वजह थी तय सीट शेयरिंग और मजबूत संगठन। लंबे समय तक अकाली दल 94 और भाजपा 23 सीटों पर चुनाव लड़ती रही। दोनों पार्टियां अपने-अपने मजबूत क्षेत्रों में चुनाव लड़ती थीं और कार्यकर्ताओं के स्तर पर भी एक-दूसरे का साथ मिलता था।

गठबंधन की वजह से दोनों दलों का वोट बंटने के बजाय एक जगह ट्रांसफर होता था और कई सीटों पर मुकाबला मजबूत बन जाता था। यही समीकरण 2012 में गठबंधन की बड़ी जीत का आधार बना, जब दोनों दलों ने मिलकर 68 सीटें जीतकर सरकार बनाई। लेकिन 2022 में गठबंधन टूटने के बाद दोनों का वोट अलग-अलग बंट गया और दोनों दल दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू पाए।

भाजपा-अकाली गठबंधन टूटने का विरोधियों पर असर

  • AAP को मिला सबसे बड़ा फायदा: भाजपा-अकाली गठबंधन टूटने से 2022 में पंजाब की राजनीति का पारंपरिक मुकाबला कमजोर हुआ। इसका सीधा फायदा आम आदमी पार्टी को मिला, जिसने खुद को तीसरे विकल्प से सत्ता के दावेदार के रूप में स्थापित किया।
  • कांग्रेस का वोट समीकरण बिगड़ा: 2017 में कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने में मदद करने वाला अकाली विरोधी वोट 2022 में बंट गया। AAP के उभार ने कांग्रेस को मुख्य मुकाबले से बाहर कर दिया।
  • विपक्षी वोटों का समीकरण बदला: भाजपा और अकाली दल के अलग-अलग लड़ने से सत्ता विरोधी वोट एकजुट नहीं रहा। AAP ने किसान आंदोलन और बदलाव की लहर का फायदा उठाकर बड़ा जनादेश हासिल किया।
  • 2027 में गठबंधन हुआ तो चुनौती बढ़ेगी: अगर भाजपा-अकाली दल फिर साथ आते हैं तो AAP और कांग्रेस के सामने मुकाबला त्रिकोणीय से ज्यादा सीधा और कठिन हो सकता है।

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