बांधे के मुताबिक, 1942 से अब तक के मुआवजे और लीज की रकम जोड़ी गई है।
रायपुर एयरपोर्ट की जमीन पर मालिकाना हक का दावा करने वाले किसान अश्विनी बांधे की कानूनी लड़ाई अब फैसले की ओर बढ़ रही है। 2018 तक करीब 3500 करोड़ रुपए का दावा करने वाले बांधे ने अब अपना क्लेम बढ़ाकर 13 हजार 173 करोड़ रुपए कर दिया है।
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उनका कहना है कि यह राशि 1942 में जमीन के रिक्विजिशन (अस्थायी कब्जे में लेना) से लेकर अब तक के लीज अमाउंट, रिवाइज्ड कंपनसेशन और उस पर देय राशि की गणना के आधार पर तय की गई है।
बता दें कि अश्विनी बांधे ने स्वामी विवेकानंद इंटरनेशनल एयरपोर्ट की टर्मिनल बिल्डिंग और गार्डन की जमीन को अपने पूर्वजों की बताया है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देश के बाद मामले में नया मोड़ आया है।
कोर्ट ने पुराने राजस्व रिकॉर्ड और दस्तावेजों की दोबारा जांच कर यह पता लगाने को कहा है कि जमीन रिक्विजिशन से पहले किसके नाम दर्ज थी। पुराने रिलीज ऑर्डर और जांच रिपोर्ट को भी देखा जाएगा। अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार तहसीलदार को मामले में अंतिम आदेश देना है।

रायपुर एयरपोर्ट की जमीन पर किसान ने किया ₹13 हजार करोड़ का क्लेम, पहले ₹3,500 करोड़ मांगे थे।

किसान का दावा- उनके पूर्वजों की जमीन को ब्रिटिश सरकार ने अस्थायी तौर पर अपने कब्जे में लिया था।
कहानी की शुरुआत 1942 के युद्धकालीन अधिग्रहण से
53 साल के किसान अश्विनी बांधे का दावा है कि उनके पूर्वजों की जमीन को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने सैन्य जरूरतों के लिए अस्थायी तौर पर अपने कब्जे में लिया था।
उस समय डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट के तहत देशभर में सैन्य प्रतिष्ठानों और एयरफील्ड के लिए बड़ी मात्रा में जमीन रिक्विजिशन की गई थी। इसी प्रक्रिया के तहत रायपुर के माना एयरफील्ड के लिए भी जमीन ली गई।
बांधे के मुताबिक, उनके पूर्वजों की करीब 30 एकड़ 18 डिसमिल जमीन भी इसी प्रक्रिया में ली गई थी। उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक जमीन के बदले 1300 रुपए प्रति एकड़ प्रतिमाह के हिसाब से राशि तय की गई थी।
उनका कहना है कि यह जमीन स्थायी रूप से सरकार को नहीं दी गई थी, बल्कि युद्धकालीन जरूरत खत्म होने के बाद इसे वापस किया जाना था। लेकिन युद्ध खत्म होने और देश की आजादी के बाद भी जमीन परिवार को वापस नहीं मिली। यहीं से परिवार की लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हुई।

1978 और 1987 में जमीन को रिक्विजिशन से रिलीज करने के आदेश जारी हुए, जबकि 1985 में रक्षा मंत्रालय ने उपयोग में नहीं आने वाली जमीन लौटाने के निर्देश दिए। इसके बावजूद परिवार को जमीन का कब्जा नहीं मिला और 2003 में अश्विनी बांधे ने कानूनी लड़ाई शुरू की।

2026 में मामला हाईकोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने पुराने राजस्व रिकॉर्ड और रिलीज ऑर्डर की दोबारा जांच के निर्देश दिए। 5 अगस्त 2026 को अश्विनी बांधे ने अपना क्लेम बढ़ाकर ₹13,173 करोड़ कर दिया। अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक तहसीलदार को मामले में अंतिम आदेश पारित करना है।

किसान ने 13 हजार करोड़ का नया क्लेम किया
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद मौजूदा तहसीलदार पुराने रिलीज ऑर्डर, राजस्व रिकॉर्ड और 2018-19 की जांच रिपोर्ट के आधार पर अंतिम आदेश पारित करेगा। ₹13,173 करोड़ का आंकड़ा किसान का संशोधित क्लेम है, कोर्ट से तय मुआवजा नहीं।

यह दस्तावेज अश्विनी बांधे ने उपलब्ध कराया है। 1987 के रिलीज ऑर्डर में मोहनलाल बांधे को जमीन वापस देने का उल्लेख है।
1978 और 1987 के रिलीज ऑर्डर में क्या है?
इस मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक 24 मई 1978 का रिलीज ऑर्डर बताया जा रहा है। इसके अलावा 20 अक्टूबर 1987 को चीफ कमांडेंट के आदेश के आधार पर भी जमीन को रिक्विजिशन से रिलीज किए जाने का उल्लेख है।
बांधे की ओर से उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों के मुताबिक, भारत सरकार के सक्षम प्राधिकारी के आदेश के आधार पर मोहनलाल बांधे, पिता अनुपलाल बांधे के पक्ष में रिलीज ऑर्डर जारी किया गया था। इसमें ग्राम रमचंडी, बरौदा, माना और धरमपुरा की भूमि का उल्लेख है।
दस्तावेज में तत्कालीन कलेक्टर रायपुर को निर्देशित किए जाने की बात है कि संबंधित भूमि मोहनलाल बांधे की है और उसे डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट के तहत तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर ने रिक्विजिशन पर लिया था।
एक्ट समाप्त होने के बाद इसे रिक्विजिशन से रिलीज करते हुए राजस्व अभिलेखों में मोहनलाल बांधे का नाम दर्ज करने और उन्हें मौके पर शांतिपूर्वक कब्जा देने का उल्लेख है। दस्तावेज में यह भी दर्ज है कि संबंधित भूमि की सरकार को अब आवश्यकता नहीं है। यही दस्तावेज अब अश्विनी बांधे के दावे का महत्वपूर्ण आधार बन गया है।

किसान ने स्वामी विवेकानंद इंटरनेशनल एयरपोर्ट की टर्मिनल बिल्डिंग और गार्डन की जमीन पर अपना मालिकाना हक होने का दावा किया है।
2018 और 2019 में सरकार ने भी कराई जांच
मामले में सिर्फ बांधे की ओर से पेश किए गए दस्तावेज ही नहीं हैं, बल्कि राजस्व विभाग के स्तर पर भी पहले जांच हो चुकी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार 12 सितंबर 2018 को नायब तहसीलदार मंदिर हसौद अनुज पटेल ने इस मामले की जांच रिपोर्ट तैयार की थी।
इसके बाद मामले की दोबारा जांच की गई। 18 नवंबर 2019 को नायब तहसीलदार एनएस चंद्राकर ने भी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की।
अश्विनी बांधे के मुताबिक इन दोनों जांचों में पुराने राजस्व रिकॉर्ड और उपलब्ध दस्तावेजों की जांच की गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट में इन जांच रिपोर्टों और पुराने रिलीज ऑर्डर का रिकॉर्ड भी मौजूद है।


साल 2017-18 में भी तहसीलदार ने दावे की जांच की थी और किसान अश्विनी बांधे के दावे को सही बताया था।
हाईकोर्ट ने फिर जांच के निर्देश दिए
2026 में मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने एक बार फिर जांच के निर्देश दिए। हाईकोर्ट ने खास तौर पर यह जांचने को कहा कि रिक्विजिशन से पहले संबंधित जमीन राजस्व रिकॉर्ड में किसके नाम दर्ज थी और वास्तविक भू-स्वामी कौन था।
बांधे का कहना है कि इस मामले की 2018 और 2019 में जांच हो चुकी है और दोनों रिपोर्ट मौजूद हैं। उनका कहना है कि पुराने रिलीज ऑर्डर भी इस दावे को मजबूत करते हैं कि रिक्विजिशन खत्म होने के बाद जमीन उनके पूर्वज के नाम पर रिलीज करने का आदेश दिया गया था।
इसके बाद उन्होंने मामले को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखा। अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इस मामले का अगला अहम पड़ाव राजस्व प्रशासन के स्तर पर होने वाला है।
अब तहसीलदार के फैसले का इंतजार
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक मौजूदा तहसीलदार को उपलब्ध दस्तावेजों, पुराने रिलीज ऑर्डर और जांच रिपोर्ट के आधार पर अंतिम आदेश देना है। यानी 35 साल से चल रही इस लड़ाई में अब फैसला राजस्व रिकॉर्ड की उस कड़ी पर टिक गया है।
जिसमें यह तय होना है कि रिक्विजिशन से पहले जमीन किसके नाम थी और बाद में रिलीज होने के बाद राजस्व रिकॉर्ड में क्या कार्रवाई की गई।
बांधे के लिए यह सिर्फ एक जमीन का विवाद नहीं है। उनका दावा है कि अगर पुराने रिकॉर्ड और रिलीज ऑर्डर को सही माना जाता है, तो उनके परिवार की जमीन युद्धकालीन जरूरत के नाम पर ली गई थी और बाद में उसे उनके पूर्वज के नाम पर रिलीज करने के आदेश भी दिए गए थे।

3500 करोड़ से अब 13 हजार करोड़ से ज्यादा का दावा
अश्विनी बांधे ने पहले करीब 3500 करोड़ रुपए का दावा किया था। यह दावा वर्ष 2018 तक की गणना के आधार पर था। अब उन्होंने क्लेम की रकम बढ़ा दी है। उनके मुताबिक, 5 अगस्त 2026 को उन्होंने संबंधित अधिकारी के सामने 13,173 करोड़ 59 लाख 88 हजार 889 रुपए का नया क्लेम पेश किया है।
इस बढ़ी हुई राशि के पीछे उनका तर्क है कि जमीन के मूल लीज अमाउंट के साथ वर्षों से लंबित भुगतान और संबंधित कानून में निर्धारित रिवाइज्ड कंपनसेशन की गणना की गई है। उनका कहना है कि 1942 से शुरू हुए इस पूरे विवाद में करीब 84 वर्ष की अवधि का हिसाब शामिल है।
हालांकि, 13,173 करोड़ रुपए अश्विनी बांधे का दावा है। यह सुप्रीम कोर्ट से तय या मंजूर मुआवजा नहीं है। अंतिम रकम और दावे की वैधता संबंधित कानूनी और राजस्व प्रक्रिया के बाद तय होगी।
दावा सिर्फ एयरपोर्ट की जमीन तक सीमित नहीं
बांधे का कहना है कि यह विवाद सिर्फ उस जमीन तक सीमित नहीं है, जहां आज एयरपोर्ट की टर्मिनल बिल्डिंग और गार्डन मौजूद हैं। उनके अनुसार माना और आसपास के इलाके के अलावा कुछ अन्य जमीनों से जुड़े पुराने रिकॉर्ड भी उनके पास हैं।
वे पिछले करीब 35 वर्षों से इन रिकॉर्ड को जुटा रहे हैं। उनका कहना है कि कई दस्तावेज ऐसे हैं जो सामान्य इंटरनेट सर्च में उपलब्ध नहीं हैं और इन्हें पुराने सरकारी रिकॉर्ड, अभिलेखागार और दूसरे विभागों से हासिल किया गया है।

दावा- अभिलेखों में उनके पूर्वजों की जमीन से जुड़े रिकॉर्ड भी मौजूद।
प्रदर्शनी में मिले थे माना एयरफील्ड के पुराने दस्तावेज
करीब एक साल पहले रायपुर में संस्कृति विभाग की पुरानी दस्तावेजों की प्रदर्शनी लगी थी। वहां अश्विनी बांधे को माना एयरफील्ड से जुड़े पुराने दस्तावेज मिले। इसके बाद उन्होंने लोक सेवा गारंटी अधिनियम के तहत इनकी प्रमाणित प्रतियां लीं। उनका दावा है कि इनमें उनके पूर्वजों के नाम और जमीन की जानकारी दर्ज है।
संस्कृति विभाग के उपसंचालक डॉ. प्रताप पारेख ने बताया कि विभाग के पास द्वितीय विश्व युद्ध के समय माना एयरफील्ड के निर्माण से जुड़े पुराने राजस्व और जमीन के दस्तावेज हैं। इनमें प्रभावित किसानों और जमीन मालिकों के नाम भी दर्ज हैं। अश्विनी बांधे ने इन दस्तावेजों की प्रतियां मांगी थीं।
अब-तक 15-20 करोड़ खर्च का दावा
बांधे का दावा है कि पिछले करीब 35 साल में कोर्ट की कार्रवाई, वकीलों की फीस, पुराने दस्तावेज जुटाने और रिकॉर्ड की तलाश में 15 से 20 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं।
उनका कहना है कि यह लड़ाई उनके परिवार की कई पीढ़ियों से चली आ रही जमीन को हासिल करने की कोशिश है। अब उनकी नजर तहसीलदार के फैसले पर है। पुराने रिलीज ऑर्डर, 2018 और 2019 की जांच रिपोर्ट और राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर तहसीलदार का फैसला इस मामले की आगे की दिशा तय करेगा।
RAIP (STR) कानून और रेकिंग रिवाइज्ड कंपनसेशन के नियम
RAIP (STR) कानून और रेकिंग रिवाइज्ड कंपनसेशन (Recurring Revised Compensation) के नियमों के मुताबिक, सरकार जिस तारीख से जमीन कब्जे में लेती है, उसके 365 दिनों (1 साल) के भीतर भुगतान करना अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं होता है, तो ब्याज की दरें समय के साथ इस तरह बढ़ती हैं:
1 से 3 साल तक: समय पर भुगतान न होने पर 9% सालाना ब्याज।
3 से 5 साल तक: इसके बाद भी राशि न मिलने पर 12% ब्याज।
5 से 15 साल तक: 5 साल बीतने पर 15% ब्याज के साथ संशोधित मुआवजा।
15 साल के बाद: इस अवधि के बाद भी भुगतान लंबित रहने पर 18% चक्रवृद्धि (Compound) ब्याज का नियम लागू होता है।
1942 से 2018 तक का हिसाब: करीब 76 साल का बकाया किराया, अलग-अलग अवधि का ब्याज, संशोधित मुआवजा और अन्य कानूनी दावों को मिलाकर अश्विनी ने सुप्रीम कोर्ट में ₹3,500 करोड़ का क्लेम किया।
2018 से जून 2026 तक: 2018 में ₹3,500 करोड़ के क्लेम के बाद भी भुगतान लंबित रहने पर आगे की ब्याज/कंपनसेशन गणना जारी रही। करीब 8 साल की अतिरिक्त गणना के बाद जून 2026 तक दावा ₹13,000 करोड़ से ज्यादा होने का दावा है।

यह दावा अश्विनी बांधे ने RAIP (STR) कानून और रेकरिंग रिवाइज्ड कंपनसेशन नियम के तहत किया है।
रिकॉर्ड पर टिकी नजर
1942 में शुरू हुआ जमीन विवाद 2026 में ₹13 हजार करोड़ से ज्यादा के दावे तक पहुंच गया है। अब 1978 और 1987 के रिलीज ऑर्डर, 2018-19 की जांच रिपोर्ट और मौजूदा जमीन रिकॉर्ड की जांच अहम होगी।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तहसीलदार दस्तावेजों और रिकॉर्ड के आधार पर फैसला देंगे। आपत्ति होने पर पक्ष आगे कानूनी रास्ता अपना सकेंगे।
(नोट: ₹13,173 करोड़ अश्विनी बांधे का संशोधित क्लेम है, कोर्ट से मंजूर मुआवजा नहीं। अंतिम फैसला संबंधित अधिकारी/कोर्ट के आदेश के बाद होगा।)
13, 173 करोड़ रुपए क्लेम के दस्तावेज




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किसान अश्विनी बांधे का दावा है कि रायपुर एयरपोर्ट की टर्मिनल बिल्डिंग और गार्डन उनके पूर्वजों की जमीन पर बना है।
रायपुर के 53 वर्षीय किसान अश्विनी बांधे का दावा है कि जिस जमीन पर आज स्वामी विवेकानंद इंटरनेशनल एयरपोर्ट की टर्मिनल बिल्डिंग और गार्डन बने हैं, वह उनकी है। बांधे के मुताबिक यह जमीन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने अस्थायी तौर पर ली थी। पढ़ें पूरी खबर…