दीपेंद्र द्विवेदी | कानपुर8 मिनट पहले
- कॉपी लिंक

आंखों की रोशनी को चुपके से छीनने वाली खतरनाक बीमारी ‘ग्लूकोमा’ (काला मोतियाबिंद) को लेकर कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज से एक बेहद राहत भरी खबर आई है। अब यह बीमारी माता-पिता से बच्चों में ट्रांसफर नहीं हो पाएगी।
मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग ने एक ऐसी जेनेटिक स्टडी (आनुवंशिक अध्ययन) की है, जिससे उन दो विलेन जीन्स (Genes) की पहचान कर ली गई है जो अगली पीढ़ी में इस बीमारी को फैलाते हैं।
इस खोज का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि बच्चों में ग्लूकोमा होने से पहले ही सिर्फ एक ब्लड टेस्ट के जरिए इसका पता लगा लिया जाएगा और वक्त रहते इलाज शुरू करके उनकी आंखों की रोशनी को हमेशा के लिए सुरक्षित कर लिया जाएगा।

80 मरीजों पर एक साल तक रिसर्च, ब्रिटिश जर्नल में छपेगा शोध
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. शालिनी मोहन के निर्देशन में डॉ. सुप्रिया ने इस रिसर्च को पूरा किया है। टीम ने ग्लूकोमा से पीड़ित 80 मरीजों पर पूरे एक साल तक बारीकी से अध्ययन किया। जब इसके शानदार नतीजे सामने आए, तो इस पूरी स्टडी को मशहूर ‘ब्रिटिश जर्नल’ में पब्लिश करने के लिए भेजा गया है। मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल प्रो. संजय काला ने भी इस सफलता को पूरे शहर के लिए गौरव बताया है और कहा है कि अत्याधुनिक उपकरणों की मदद से हो रहा यह शोध समाज के लिए कारगर साबित होगा।
ये हैं वो दो ‘विलेन जीन’ जो आंखों की रोशनी छीन रहे थे
रिसर्च के दौरान डॉक्टरों ने स्पेशल किट की मदद से मरीजों के ब्लड सैंपल लिए। जेनेटिक कोडिंग की जांच में दो ऐसे जीन सामने आए जो आंखों के अंदरूनी दबाव (Pressure) को बिगाड़कर देखने वाली नस (ऑप्टिक नर्व) को डैमेज कर रहे थे। इसमें पहला सीडीकेएनटूबी (CDKN2B) जीन है, जो 37 प्रतिशत मरीजों में मिला।
यह जीन सबसे ज्यादा खतरनाक पाया गया क्योंकि यह सीधे तौर पर गंभीर ग्लूकोमा के लिए जिम्मेदार है और मरीज की आंखों की रोशनी बहुत तेजी से कम करता है। दूसरा एएसवन (AS1) जीन है, जो 41 प्रतिशत मरीजों में पाया गया। डॉक्टरों के मुताबिक यह जीन आज की खराब लाइफस्टाइल के कारण शरीर में ज्यादा एक्टिव हो रहा है।
राहत की बात यह है कि अगर परिवार में किसी को काला मोतियाबिंद है, तो उनके बच्चों की समय पर जेनेटिक जांच और डॉक्टर से फॉलोअप करवाकर इस खतरे को समय रहते पूरी तरह खत्म किया जा सकता है।

ओपीडी में हर दिन आ रहे 12 से 15 मरीज, अब युवा भी निशाने पर डॉक्टरों के मुताबिक, काला मोतियाबिंद को ‘साइलेंट थीफ’ यानी आंखों का अदृश्य चोर कहा जाता है क्योंकि इसके लक्षण शुरुआत में पता नहीं चलते। पहले यह बीमारी अमूमन 40 साल की उम्र के बाद होती थी, लेकिन अब बिगड़ती लाइफस्टाइल और अन्य शारीरिक बदलावों के कारण बच्चे और युवा वर्ग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। हैलट अस्पताल की हर ओपीडी में औसतन 12 से 15 नए मरीज मिल रहे हैं। इन लक्षणों को बिल्कुल न करें नजरअंदाज, समय पर जांच जरूरी डॉ. शालिनी के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति या बच्चे की आंख और सिर में लगातार दर्द बना रहता है, या फिर सामने का तो साफ दिखता है लेकिन आसपास या गोलाई में देखने का क्षेत्रफल कम होने लगा है, तो ऐसे मरीजों को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए।
यह ग्लूकोमा के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में बिना लापरवाही किए तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञ से अपनी आंखों की जांच करानी चाहिए, क्योंकि वक्त पर सही पहचान ही इस बीमारी से बचने का एकमात्र रास्ता है।
