नई दिल्ली10 मिनट पहले
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खाने-पीने के किसी पैक सामान में अगर नमक-शकर या सैचुरेटेड फैट की मात्रा लिमिट से ज्यादा हुई तो पैकेट पर षटकोण लाल निशान होगा। चेतावनी भी लिखी होगी। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने यह प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट में पेश किया है। इसका मकसद ऐसे फूड आइटम को लेकर लोगों को सावधान करना है।
FSSAI के प्रस्ताव के मुताबिक, यह वार्निंग लेबल लाल रंग के षट्कोण (हेक्सागोनल- 6 कोनों वाला) आकार का होगा। इसे पैकेट के फ्रंट यानी ठीक सामने की तरफ लगाया जाएगा।

चैरिटेबल ट्रस्ट की जनहित याचिका पर एक्शन
दरअसल, 3S एंड अवर हेल्थ सोसाइटी नाम के एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर डिब्बा बंद या पैकेट वाले खाने पर अनिवार्य वार्निंग लेबल लगाने की मांग की थी।
इस मामले की पिछली सुनवाई (13 अगस्त) के दौरान जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने FSSAI को नियमों में देरी के लिए फटकार लगाई थी और पूछा था कि क्या सरकार नहीं चाहती कि उसके लोग स्वस्थ रहें? इसके बाद FSSAI ने यह हलफनामा पेश किया है।
दो फेज में लागू करने का प्रस्ताव
FSSAI ने इसे अलग-अलग फेज में लागू करने का प्रस्ताव दिया है, ताकि इंडस्ट्री को अपने प्रोडक्ट्स को सुधारने का मौका मिले।
फेज 1: पहले चरण में उन प्रोडक्ट्स पर लाल लेबल लगेगा, जिनमें फैट, शुगर या साल्ट में से कोई भी ‘दो या दो से अधिक’ चीजें तय सीमा से ज्यादा होंगी। इसमें सभी अधिक मीठी कोल्ड ड्रिंक्स भी शामिल होंगी।
फेज 2: दूसरे चरण में यह नियम उन प्रोडक्ट्स पर भी लागू हो जाएगा, जिनमें इनमें से कोई ‘एक’ चीज भी ज्यादा मात्रा में होगी।
10 सवाल-जवाब से समझते हैं पूरा मामला क्या है और इसकी जरूरत क्यों पड़ी…
सवाल 1: FSSAI ने सुप्रीम कोर्ट में क्या प्रस्ताव दिया है?
जवाब: FSSAI ने शीर्ष अदालत को सूचित किया है कि वह ज्यादा फैट, ज्यादा चीनी और नमक वाले खाने-पीने की चीजों के पैकेट पर सामने की तरफ एक लाल रंग का चेतावनी लेबल लगाने का प्रस्ताव दिया है। यह लेबल लोगों को आसानी से समझ आने वाली चेतावनी देगा।
सवाल 2: नियमों को तय करने का आधार या पैमाना क्या है?
जवाब: कोई भी फूड प्रोडक्ट हाई फैट, हाई शुगर या हाई साल्ट (HFSS) की श्रेणी में आता है या नहीं, इसका फैसला ICMR-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (ICMR-NIN) द्वारा जारी ‘डायट्री गाइडलाइंस फॉर इंडियंस, 2024’ के मानकों के आधार पर किया जाएगा।
सवाल 3: क्या कुछ खाद्य पदार्थों को इस लाल लेबल से छूट भी मिली है?
जवाब: हां, कुछ चुनिंदा कैटगरी को इससे बाहर रखने का प्रस्ताव है। सिंगल-इंग्रीडिएंट (सिर्फ एक सामग्री वाले) प्रोडक्ट्स और ऐसे पदार्थ जो प्राकृतिक रूप से ही फैट, शुगर या नमक से भरपूर होते हैं, उन्हें छूट मिलेगी। उदाहरण के लिए शुद्ध घी, खाद्य तेल, साधारण नमक, चीनी, गुड़ और शहद को इस फ्रंट-ऑफ-पैक वार्निंग से छूट दी जाएगी।
सवाल 4: FSSAI के मुताबिक इस नए नियम का सबसे बड़ा फायदा किसे होगा?
जवाब: FSSAI ने कोर्ट को बताया है कि इस उपभोक्ता-अनुकूल लेबलिंग व्यवस्था से लोग जागरूक होकर भोजन का चुनाव कर सकेंगे। इसका सबसे बड़ा फायदा बच्चों और समाज के संवेदनशील या कमजोर वर्गों को होगा, जो अनजाने में अत्यधिक अस्वस्थ चीजें खा लेते हैं।
सवाल 5: ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ क्या है?
जवाब- फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग (FOPL) वह लेबल है, जो किसी फूड प्रोडक्ट के पैकेट के आगे के हिस्से में लिखा रहता है। इसमें खाने के मेन इंग्रीडिएंट्स जैसे शुगर, नमक और फैट की जानकारी को आसान और जल्दी समझ आने वाले तरीके से दिखाया जाता है।
इसका मकसद ये है कि ग्राहक तुरंत समझ सके कि वो जो फूड खरीद रहा है, वह स्वास्थ्य के लिए कितना सही है। ये जानकारी पैकेट के बैक पर लिखे लंबे‑चौड़े न्यूट्रिशनल फैक्ट्स से अलग होती है। इसमें सिर्फ जरूरी जानकारी को सरल ग्राफिक्स या रंगों के जरिए दिखाया जाता है।
सवाल 6: मौजूदा पैकेज्ड फूड पर फूड से जुड़ी न्यूट्रिशनल जानकारी कहां लिखी होती है?
जवाब- यह आमतौर पर पैकेज्ड फूड के पीछे या किनारे पर एक टेबल के फॉर्म में लिखी होती है। यह जानकारी प्रोडक्ट के 100 ग्राम, 100 मिलीलीटर या हर सर्विंग में मौजूद न्यूट्रिशनल वैल्यू जैसे- कैलोरी, फैट, प्रोटीन, शुगर और सोडियम की मात्रा बताती है।
सवाल 7: ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ से क्या पता चलता है?
जवाब- फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग से पता चलता है कि फूड हेल्दी है या अनहेल्दी। उसमें कितनी कैलोरी, शुगर, नमक और फैट है और क्या वह स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। डिटेल नीचे ग्राफिक में देखें–

सवाल 8: ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ क्यों जरूरी है?
जवाब- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ इसलिए जरूरी है ताकि लोग पैकेज्ड फूड खरीदते समय जल्दी और स्पष्ट रूप से उसके हेल्थ इम्पैक्ट को समझ सकें। इससे उनके लिए हेल्दी ऑप्शन्स चुनना आसान हो जाएगा और अनहेल्दी फूड के अधिक सेवन को रोका जा सकेगा।
सवाल 9: ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ से हमें क्या फायदा होगा?
जवाब- फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग का मकसद न्यूट्रिशन की जटिल जानकारी को सरल बनाना है, ताकि ग्राहक खरीदते समय ही बेहतर फैसला ले सकें और अनहेल्दी विकल्पों से बच सकें। नीचे दिए ग्राफिक से इसके फायदे समझिए-

सवाल 10: सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI को लोगो का निर्देश क्यों दिया?
जवाब- देश में लाइफस्टाइल बीमारियां तेजी से बढ़ रही है। इसकी बड़ी वजह अनहेल्दी खान-पान है। पैकेज्ड और अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड में मौजूद अधिक शुगर, नमक और फैट की मात्रा इन बीमारियों का बड़ा कारण बन रही है।
इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI से कहा है कि वह पैकेज्ड फूड पर ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ लागू करने पर गंभीरता से विचार करे, ताकि लोग खरीदते समय ही संभावित हेल्थ रिस्क समझ सकें। ग्राफिक से समझते हैं कि भारत में लाइफस्टाइल बीमारियों की स्थिति कितनी गंभीर है-

अब समझें सैचुरेटेड और अनसैचुरेटेड फैट क्या है
- सैचुरेटेड फैट: यह घी, मक्खन, मलाई, पनीर, चीज, फैटी मीट और नारियल तेल या इससे बनी चीजों में ज्यादा होता है। इसे ज्यादा खाने से खून में LDL यानी खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है। यह नुकसानदायक है।
- अनसैचुरेटेड फैट: यह मुख्य रूप से मूंगफली, बादाम, अखरोट, तिल, सरसों का तेल, जैतून का तेल और मछली में पाया जाता है। यह सही मात्रा में लेना हार्ट के लिए फायदेमंद माना जाता है।
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