CM Face or State Chief; Threatens Split

कांग्रेस हाईकमान पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से ठीक गुटबाजी खत्म करने, सोशल और रिजनल इक्वेशन को सेट करने के चक्कर में पार्टी में बगावत को हवा दे बैठा। पंजाब कांग्रेस प्रधान की कुर्सी न मिलने से पूर्व CM चरणजीत चन्नी बेहद नाराज हैं। इसी वजह से कैंपेंनिं

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चन्नी ही नहीं बल्कि उनके पूरे गुट ने हाईकमान के इस फैसले को नकार दिया। चरणजीत सिंह चन्नी ने आज (3 जुलाई) को अपने समर्थक सांसदों, विधायकों व हलका इंचार्जों की कैठक बुला दी है। बैठक में दो से तीन सांसद, 10 से 12 विधायकों और 40 के करीब हलका इंचार्जों के पहुंच सकते हैं। चन्नी अपने समर्थक नेताओं के साथ विचार विमर्श करके कोई बड़ा फैसला लेंगे।

जिससे साफ है कि पंजाब कांग्रेस में फिर से कोई बड़ा धमाका होने वाला है। चन्नी के एक करीबी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया-

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प्रधान न बनाए जाने से चन्नी बहुत खफा हैं और अब उन्होंने आर-पार की लड़ाई का फैसला कर दिया है। वह शक्ति प्रदर्शन कर हाईकमान को अपनी ताकत का एहसास कराना चाहते हैं।

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चन्नी के शक्ति प्रदर्शन के 2 मकसद, एक्सपर्ट से जानिए:-

1. वड़िंग हटाओ, कैप्टन की तरह प्रधान बनाओ पॉलिटिकल एक्सपर्ट पवनदीप शर्मा का कहना है कि पंजाब कांग्रेस में एक प्रचलन रहा है कि जो पार्टी प्रधान होता है, वही सीएम बनता है। कैप्टन अमरिंदर सिंह दोनों बार चुनाव से पहले अध्यक्ष बनाए गए और जब पार्टी ने चुनाव जीता तो उन्हें ही सीएम बनाया गया।

इसी कुर्सी पर नजर रखते हुए चन्नी गुट लंबे समय से राजा वड़िंग के विरोध में रहा है, यह किसी से छुपा नहीं है। पार्टी की इंटरनल मीटिंग हो या फिर हाईकमान के सामने सब जगह चन्नी राजा वड़िंग को फेल लीडर बता चुके हैं और उन्हें प्रधान पद से हटाने की वकालत भी कर चुके हैं।

2017 में जब कांग्रेस की सरकार आई तो इसी तरह कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी कांग्रेस हाईकमान पर दबाव बनाया था कि उन्हें प्रधान बनाएं। जब प्रताप बाजवा को प्रधान पद से हटाया गया था। प्रधान बनने का मकसद साफ होता है कि टिकट बंटवारे में उनकी ही चले और जब विधायक जीतकर आएं तो ज्यादातर विधायक उनके समर्थक हों और उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी का रास्ता साफ रहे। कैप्टन ने इसके लिए जाट महासभा तक को एक्टिव कर दिया था।

चन्नी भी कैप्टन के रास्ते पर हैं। वह चाहते हैं कि हाईकमान उन्हें प्रधान बनाए ताकि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो राजा वड़िंग ये क्रेडिट न ले सकें कि प्रधान होने के नाते यह जीत उनकी अगुआई में हुई है। फिर वह सीएम कुर्सी पर भी दावा ठोक सकते हैं।

2. प्रधान नहीं तो मुझे ‘सीएम चेहरा’ घोषित करो 2022 में नवजोत सिद्धू प्रधान थे और चरणजीत चन्नी मुख्यमंत्री, इसीलिए तब हाईकमान पर दबाव डाला गया कि सीएम चेहरा घोषित करें। इसकी वजह ये थी कि प्रधान सिद्धू थे और सीएम चन्नी। चन्नी पंजाब कांग्रेस के ट्रेंड से वाकिफ थे कि अगर सिद्धू की प्रधानगी में चुनाव जीते तो सीएम कुर्सी मिलनी मुश्किल है।

इसलिए सिद्धू को उकसाया गया और अंदरूनी तौर पर चन्नी लॉबिंग करते रहे। फिर पहली बार कांग्रेस ने पंजाब में औपचारिक तौर पर चन्नी को सीएम चेहरा घोषित करना पड़ा। माना जा रहा है कि चन्नी उसी पैटर्न पर चल रहे हैं। वह चाहते हैं कि हाईकमान उन्हें प्रधानगी की कुर्सी दे। अगर ऐसा नहीं होता तो चाहे राजा वड़िंग प्रधान रहें लेकिन पिछली बार की तरह उन्हें CM चेहरा घोषित किया जाए।

पॉलिटिकल एक्सपर्ट पवनदीप शर्मा का कहना है कि कांग्रेस जट्‌टसिखों को नाराज नहीं करना चाहती थी। इसलिए वड़िंग को नहीं हटाया। इसीलिए चन्नी अब पार्टी हाईकमान पर उन्हें सीएम फेस घोषित करने का दबाव बना रहे हैं। चन्नी के पास समर्थक नेताओं की लंबी फौज है। ऐसे में समर्थकों और 31% दलित वोट बैंक के जरिए वह हाईकमान पर दबाव बनाने की कोशिश करेंगे।

यह फोटो साल 2022 की है, जब राहुल गांधी ने चरणजीत चन्नी को सीएम चेहरा घोषित किया था। दूसरे दावेदार नवजोत सिद्धू थे। हालांकि कांग्रेस 117 में से महज 18 सीटें जीत पाई। चन्नी 2 सीटों से चुनाव हार गए थे। - फाइल फोटो

यह फोटो साल 2022 की है, जब राहुल गांधी ने चरणजीत चन्नी को सीएम चेहरा घोषित किया था। दूसरे दावेदार नवजोत सिद्धू थे। हालांकि कांग्रेस 117 में से महज 18 सीटें जीत पाई। चन्नी 2 सीटों से चुनाव हार गए थे। – फाइल फोटो

चन्नी की दोनों मांगें दरकिनार तो क्या रास्ता बचा? पॉलिटिकल एक्सपर्ट पवनदीप शर्मा का कहना है कि चरणजीत चन्नी पहले तो कांग्रेस पर पूरा दबाव बनाएंगे कि या तो उन्हें अध्यक्ष बनाया जाए या फिर सीएम फेस घोषित किया जाए। अगर दोनों में से कुछ भी नहीं हुआ तो उनके पास प्लान बी है। प्लान बी के तहत वो अपने समर्थकों के साथ नई पार्टी का गठन कर सकते हैं।

अगर ऐसा हुआ तो यह कांग्रेस के लिए बड़ा नुकसान माना जाएगा। उनका कहनना है कि चन्नी के साथ एक बड़ा दलित वर्ग जुड़ा है। 2021 में उनके 111 दिन के कार्यकाल से भी अच्छी छवि बनी है। अगर चन्नी बगावत करते हैं या अलग पार्टी बनाते हैं, तो कांग्रेस के पारंपरिक दलित और गरीब तबके में मैसेज जाएगा कि उनके नेता की सुनवाई नहीं हुई। ऐसे में यह वोट बैंक पूरी तरह से खिसक जाएगा, जिसका सीधा फायदा विरोधी दलों को मिलेगा।

चन्नी गुट के दिग्गज नेताओं का इस फैसले पर क्या रवैया चन्नी गुट के किसी भी नेता ने हाईकमान के फैसले पर कोई धन्यवाद नहीं किया। इनमें MLA राणा गुरजीत, MLA परगट सिंह, पूर्व डिप्टी सीएम ओपी सोनी, पूर्व MLA भारत भूषण आशू प्रमुख नेता हैं। कपूरथला से MLA राणा गुरजीत की एक रील भी सुर्खियों में है, जिसमें उन्होंने ‘पातशाही दा वा रखदे हां, खंडियां दी धार ते नचदे हां, सानू औंदा है बदला लैंणा’ सॉन्ग लगा रखा है। इससे ये कयास लगाए जा रहे हैं कि वह भी चन्नी की लड़ाई में उनके साथ हैं। राणा गुरजीत ने 2022 में AAP की आंधी के बावजूद न केवल अपनी सीट जीती बल्कि अपने बेटे राणा इंदरप्रताप को भी सुल्तानपुर लोधी से निर्दलीय जिता दिया।

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