दीपेंद्र द्विवेदी | कानपुर2 मिनट पहले
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कानपुर शहर के एलएलआर (हैलेट) अस्पताल में मोतियाबिंद का ऑपरेशन अब और भी आसान और सस्ता होने जा रहा है। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में स्विट्जरलैंड की ‘ऑटली’ कंपनी की नई फेको मशीन लगाई गई है। विभागाध्यक्ष डॉ. परवेज खान ने बताया कि, इस मशीन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें किसी ‘कैसेट’ की जरूरत नहीं पड़ती।
अभी तक जो मशीनें आ रही थीं, उनमें हर ऑपरेशन पर 2500 से 4000 रुपए का एक डिस्पोजेबल कैसेट लगाना पड़ता था। सरकारी अस्पताल में बजट और प्रोक्योरमेंट की दिक्कतों की वजह से कई बार काम अटक जाता था, लेकिन अब यह खर्च पूरी तरह जीरो हो गया है। करीब 40 लाख की लागत वाली यह मशीन कानपुर में पहली बार आई है।

मरीजों का समय बचेगा, शाम तक नहीं करना होगा इंतजार
डॉ. परवेज खान ने बताया कि, मेडिकल कॉलेज में मरीजों के इलाज के साथ-साथ छात्रों की ट्रेनिंग भी होती है। पहले ओटी (ऑपरेशन थिएटर) शाम 7-8 बजे तक चलती थी, जिससे मरीज सुबह से शाम तक परेशान होते थे। अब विभाग में एक साथ तीन टेबल पर ऑपरेशन हो रहे हैं। इससे काम जल्दी निपट रहा है और मरीजों की संख्या भी बढ़ गई है। अब कम समय में ज्यादा लोगों के आंखों की रोशनी लौटाई जा रही है।
मोतियाबिंद के बाद दोबारा सफेदी आने का झंझट खत्म
अक्सर मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद कुछ मरीजों को दोबारा सफेदी (PCO) आने की शिकायत होती है। इस स्विस मशीन की तकनीक ऐसी है कि इस तरह के कॉम्प्लिकेशंस की गुंजाइश बहुत कम है। यह मशीन न केवल मजबूत है, बल्कि इसका रखरखाव भी काफी सस्ता है। डॉ. खान ने बताया कि रिसर्च के मामले में जीएसवीएम का नेत्र विभाग पूरे कॉलेज में नंबर-1 है और यह नई मशीन इस रिसर्च कार्य में भी काफी मददगार साबित होगी।
इसलिए खास है यह नई मशीन नेत्र रोग विभाग के पास आई यह मशीन दुनिया की सबसे ‘स्टर्डी’ मशीनों में गिनी जाती है। पिछले 20 सालों से मार्केट में इसका कोई मुकाबला नहीं है क्योंकि यह टूटती-फूटती कम है। हैलेट जैसे अस्पताल के लिए, जहाँ मरीजों का भारी दबाव रहता है, ऐसी मजबूत मशीन का होना किसी वरदान से कम नहीं है। अब बिना किसी अतिरिक्त लागत के यहाँ के मरीजों को वर्ल्ड क्लास तकनीक का लाभ मिल सकेगा।
